शहर में बेहतर जीवन का सपना – हमारे स्कूल के बच्चे- 18 अक्टूबर 2013

परोपकार

हर शुक्रवार की तरह मैं आज भी आपको अपने स्कूल के दो बच्चों से मिलवाना चाहता हूँ। इस बार आप दो नए विद्यार्थियों से मिलेंगे, जिनके नाम दीपक और सूरज हैं और जो क्रमशः ग्यारह और नौ साल के हैं। किसी दूसरे स्कूल में प्रवेश लेने के अलावा वृन्दावन आकर रहना उनके जीवन में आया दूसरा (एक) बड़ा बदलाव था। वे मई 2013 में, जब उनके पुराने स्कूल की वार्षिक पढ़ाई खत्म हो चुकी, अपने गाँव से यहाँ आकर बस गए थे। इस तरह उनके जीवन में एक नया पृष्ठ जुड़ गया था।

दीपक और सूरज का परिवार एक छोटे से गाँव का रहने वाला है, जो वृन्दावन से दो घंटे के सफर की दूरी पर स्थित है। उनके दादा यानी उनके पिता के पिता के पास खेत का एक टुकड़ा था, जो उनके चार बच्चों का लालन-पालन करने के लिए पर्याप्त था। लेकिन इन चार बच्चों के चार परिवार उतने से खेत के बल पर अपने और अपने बाल-बच्चों के जीवन सुचारु रूप से नहीं चला सकते थे इसलिए वे दूसरे कामों की तलाश में निकल पड़े। दीपक के पिता कई माह पहले वृन्दावन आ गए थे और एक होटल में उन्हें वाचमैन के रूप में नौकरी मिल गई। सप्ताह में एक बार छुट्टी मिलती थी, तब वे अपने परिवार की खोज-खबर लेने गाँव जाते थे। इस बार जब मई में स्कूल की सालाना पढ़ाई खत्म हुई तो बाल-बच्चे भी वृन्दावन आ गए।

तीन बच्चों का यह पिता 3000 रुपए, जो 50 डॉलर से भी कम होते हैं, माहवार कमाता है और उसे रहने के लिए एक कमरा भी मिला हुआ है। तो उस छोटे से कमरे में अब पाँच लोग किसी तरह ठुँसे हुए हैं। वह कमरा ही उनका बेडरूम, रसोई, लिविंग रूम और खेल-कूद का कमरा है। उनके पास एक बालकनी जैसा खुला बरामदा (गैलरी) है, जिसे वे उपयोग में ला सकते हैं। यह सब पर्याप्त नहीं है मगर बच्चों के माता-पिता को इतने से ही संतोष है क्योंकि वे इसमें बेहतर भविष्य बनाने का मौका देखते हैं: गाँव से दूर, शहर में रहकर कुछ बनने का अवसर! नियमित नौकरी, बच्चों के लिए गाँव के स्कूल से बेहतर पढ़ाई, संभव हो तो कुछ बचत और भविष्य में शांति पूर्ण, स्थिर जीवन का सपना!

ये उनके सपने थे मगर जब वे वृन्दावन आए तो उन्हें पता चला कि बच्चों के लिए जिस अच्छे स्कूल के बारे में उन्होंने सुन रखा था, वहाँ की पढ़ाई का खर्च वे वहन नहीं कर सकेंगे! आखिर बच्चे किन स्कूलों में कुछ सीख पाते हैं? निजी स्कूलों में, जो हर चीज़ की फीस वसूल करते हैं और जहां की किताबें भी महंगी होती हैं! वे हताश हो रहे थे कि एक दिन उन्होंने किसी पड़ोसी से एक ऐसे स्कूल के बारे में सुना जहां सारी किताबें मुफ्त दी जाती हैं, जहां स्कूल की वर्दी का एक पैसा नहीं देना पड़ता और जहां कोई प्रवेश फीस या परीक्षा फीस नहीं ली जाती! तो इस तरह एक दिन, जब स्कूल में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू हुई तो वे हमारे स्कूल के सामने खड़े थे!

दीपक छठवीं कक्षा में है और सूरज चौथी में। पिछले दिनों हुई त्रैमासिक परीक्षा में दीपक कक्षा में पहले नंबर पर रहा और उनके शिक्षक बताते हैं कि दोनों बच्चे मेहनती और प्रतिभाशाली हैं और कक्षा में बहुत एकाग्रता के साथ पढ़ाई करते हैं और शिक्षकों की बात सुनते हैं। उन्होंने नए मित्र बना लिए हैं और भावनात्मक रूप से स्कूल से जुड़ गए हैं। अब वे हमारे स्कूल का एक हिस्सा बन गए हैं और हम उनके माता-पिता के सपनों को पूरा करने में जो भी बन सकेगा, करेंगे, अर्थात बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के अपने काम में कोई कसर नहीं उठा रखेंगे।

%d bloggers like this:
Skip to toolbar