नौ साल की उम्र में पहली बार स्कूल जाना – हमारे स्कूल के बच्चे – 14 मार्च 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

कुछ सप्ताह पहले हम अपने स्कूल के एक बच्चे, रोहित से मिलने उसके घर गए और आज मैं उसका परिचय आपसे करवाने जा रहा हूँ।

रोहित नौ साल का है लेकिन अभी हमारे स्कूल की नीचे से महज दूसरी कक्षा, अपर केजी में पढ़ रहा है। किसी ढंग के स्कूल में पढ़ाई का यह उसका पहला वर्ष है, जबकि उसने वर्णमाला और पढ़ाई की कुछ दूसरी बुनियादी बातें अपने पड़ोसी के यहाँ सीखी हैं। क्या कारण है कि 2013 तक वह किसी ठीक-ठाक स्कूल में नहीं जा सका? क्योंकि उसके अभिभावक भी अनपढ़ हैं और शिक्षा को विशेष महत्व नहीं देते- और फिर पढ़ाई-लिखाई में पैसा भी तो लगता है! और पैसा उनके पास नहीं है।

रोहित का पिता एक मजदूर है और रोज़ी कमाने के लिए एक बैलगाड़ी चलाता है। लेकिन पैसा वह अपने पास नहीं रखता! उसे वह अपने पिताजी को दे देता है, जो कि उसके पारंपरिक संयुक्त परिवार के मुखिया हैं और जिनके साथ वे सब रहते हैं। रोहित के दादा-दादी परिवार चलाते हैं और उनके दोनों बेटे जो भी रोज़ कमाते हैं, शाम को लाकर उनके पास रख देते हैं, जिससे घर के सारे सदस्यों का पेट भर सके, उनके कपड़े-लत्ते खरीदे जा सकें और सभी साथ रह सकें।

लेकिन रोहित, पाँच साल छोटी उसकी बहन और उसके माता-पिता सामूहिक घर से निकलने की योजना बना रहे हैं: दरअसल, सड़क के उस पार एक ज़मीन का टुकड़ा भी उनके परिवार की संपत्ति है। फिलहाल वहाँ उनका बैल बंधा रहता है मगर उनका खयाल है कि रोहित के दादा अपने बड़े बेटे के लिए वहाँ जल्द ही एक और मकान बनवाएंगे। सामूहिक परिवार में सबसे बड़े सदस्य की मर्ज़ी पर सब कुछ निर्भर होता है।

भविष्य में जो भी हो, वास्तविकता यह है कि परिवार के पास ज़्यादा धन नहीं है और इसलिए जब पिछले साल रोहित की माँ उसे लेकर हमारे स्कूल आई तो हमने तुरंत निर्णय लिया कि रोहित को अपने स्कूल में पढ़ाया जाए। रोहित की शिक्षिकाएँ चीजों को समझने की उसकी शक्ति से बहुत प्रभावित हैं-लेकिन इसका कारण यह भी हो सकता है कि इस निचली कक्षा में सामान्य रूप से पढ़ने वाले बच्चों से पहले ही वह तीन साल बड़ा है। हमारे स्कूल में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता: कक्षा में उससे बड़े बच्चे भी पढ़ रहे हैं!

हमने उसके परिवार वालों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश की है कि वे रोहित की बहन को भी हमारे स्कूल में पढ़ने भेजें, जिससे बच्चों के बड़े होने पर शिक्षा का महत्व उनके सामने उजागर हो सके।

हम जो भी कर सकते हैं, कर रहे हैं-और अगर आप भी किसी बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके हमारी मदद करना चाहते हैं तो उसका तहेदिल से स्वागत है!