आज हम अपने स्कूल के कुछ और बच्चों से मिलने उनके घर गए। उनमें से एक होनहार बच्चा, सोनू, जो यू के जी में पढ़ता है, हमें सीधे अपने घर ले गया। रुकिए, सीधे नहीं-दूसरों की छत पर चढ़कर, वहाँ से होते हुए उसके घर!
तो इस तरह छत से होते हुए हम सोनू के घर पहुँचे और वहाँ से सँकरी सीढ़ियाँ उतरकर उनके छोटे से आँगन में पहुँचे, जिसे वे दूसरे कई किराएदारों और उनके मकान-मालिक के परिवार के साथ साझा करते हैं। घर में एक और प्रवेशद्वार है-लेकिन वहाँ से उनके घर तक पहुँचना और भी मुश्किल है! खैर, जल्द ही सोनू की माँ और उसके दो भाई भी हमारे आसपास आकर बैठ गए। सोनू का तीसरा भाई उस समय नहा रहा था।
सोनू का पिता ड्राईवर है और किसी सेठ की निजी कार चलाता है। उसे 6000 रुपए यानी लगभग 100 डॉलर प्रतिमाह मिलते हैं। संडास सहित उस एक कमरे के घर का किराया 1200 रुपए यानी लगभग 20 डॉलर प्रतिमाह है। हमने सोनू की माँ से पूछा कि इतना किराया देने के बाद घरेलू और दीगर खर्चों के लिए उसके पास पर्याप्त रकम बच पाती है या नहीं। वह मुस्कुराई और कहा, ‘किसी तरह काम तो चलाना ही पड़ता है!’
उसने बताया: चार बच्चों के साथ, उनके कपड़े-लत्तों के खर्चे, भोजन-पानी के खर्चे और कभी यह तो कभी वह, खर्चे लगे ही रहते हैं। और सबसे बड़े बच्चे की स्कूल-फीस एक नियमित खर्च होता है। यही एकमात्र कारण है कि उन्होंने सोनू को हमारे स्कूल में भर्ती कराया है-क्योंकि यहाँ वह न सिर्फ मुफ्त शिक्षा पा रहा है बल्कि उसे दोपहर में गरमागरम भोजन भी प्राप्त हो जाता है!
सोनू का सबसे बड़ा भाई ग्यारह साल का है। दूसरा दस का, तीसरा सोनू है, जो आठ का है और सबसे छोटा पाँच साल का है। दूसरे नंबर का भाई, विष्णु स्कूल नहीं जाता। उसे तीन साल की उम्र से ही अक्सर मिर्गी आती रही है। डॉक्टरों ने दवाइयाँ लिखकर दीं हैं और वह उन्हें नियमित रूप से ले रहा है। उसकी माँ बताती है कि उसकी हालत में अब सुधार है लेकिन अब भी कभी-कभी आ जाती है। ऐसा लगता है कि बीमारी और दवाइयों ने उसकी सोचने-समझने की शक्ति पर असर डाला है क्योंकि कुछ पूछने पर अचानक उसकी आँखें तिरछी होकर शून्य में कहीं भटकने लगती हैं और काफी देर बाद, जैसे काफी सोचना पड़ रहा हो, वह जवाब दे पाता है।
लेकिन सोनू बहुत तेज़ और समझदार बालक है! उसे पढ़ाई में बहुत आनंद आता है हालांकि अभी वह यू के जी में ही है, जो मुख्य कक्षाओं से पहले की दूसरी कक्षा है।
इतने सारे घर देखने के बाद हमने एक बार फिर ‘एक दूसरा घर’ देखा लेकिन वह भी दूसरे किसी भी घर से अलग नहीं था। और एक बार फिर हम यह सोचने को मजबूर हो गए: क्या कोई इस तरह रह सकता है, छह लोग एक छोटे से कमरे में ठुँसे हुए, पंद्रह-बीस दूसरे लोगों के साथ एक छोटे से आँगन में किसी तरह गुज़ारा करते हुए?
सोनू के लिए हम सब कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे उसका भविष्य सुधर सके! आप भी उस जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं। किसी एक बच्चे को या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!
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