आठ साल की बचत जालसाजों ने लूट ली – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 फरवरी 2015

परोपकार

कल हम आश्रम के बाहर टहलते हुए एक बच्चे, दीपू से मिलने चले गए, जो वास्तव में आश्रम के पास ही रहता है। दीपू ग्यारह साल का है और तब से हमारे स्कूल में पढ़ रहा है, जब हमने 2007 में अपने स्कूल का शुभारंभ किया था। उस समय हमारे यहाँ बहुत थोड़े से बच्चे और ‘नर्सरी’ की एक कक्षा भर थी-और अब दीपू छोटा बच्चा नहीं रह गया है और चौथी कक्षा में पढ़ रहा है।

हमने एक दीवार में बने छेद से उलांघकर घर में प्रवेश किया। यही उस मकान का प्रवेश द्वार है, जहाँ दीपू और उसका परिवार रहते हैं। उनके पास इससे अधिक कुछ नहीं है: एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा, जिस पर ईंटों का एक कमरा, जिसे प्लास्टिक की पन्नियों से ढँक दिया गया है और सामने भी एक प्लास्टिक के बैग की आड़ बनाकर छोटी सी काम चलाऊ जगह, जिसे कमरा कहना भी मुश्किल ही है लेकिन जहाँ से अंदर झाँककर देखा जा सकता है।

दीपू के पिता ने बताया कि वे वहाँ अभी आठ माह पहले ही आए हैं। उससे पहले आठ साल वे एक दूसरे घर में रह रहे थे, जो उसके मालिक का था, जिसके यहाँ वह नौकरी करता था। वहाँ वह 3000 रुपए यानी लगभग 50 डॉलर प्रतिमाह कमाता था। लेकिन इस वेतन का आधा हिस्सा वह नहीं लेता था। उसके मालिक ने, जो एक धार्मिक व्यक्ति था और अपने आपको ‘संत’ कहता था, उससे कहा था कि यह आधा वेतन वह जमा करता रहेगा और जब पर्याप्त रुपया जमा हो जाएगा तब उसके लिए ज़मीन का एक टुकड़ा खरीद देगा।

इसी कारण दीपू का यह परिवार, जिसमें माता-पिता और तीन बहनों और दो भाइयों को मिलाकर कुल आठ लोग थे, 1500 रुपए यानी 25 डॉलर की मासिक आय पर आठ साल तक अत्यंत कठिन समय बिताता रहा। कभी-कभी वे छोटी-मोटी दुकान लगाकर कुछ बेच-बाच लेते या सिलाई वगैरह करते, जिससे अतिरिक्त आमदनी हो सके और किसी तरह इतने बड़े परिवार का गुज़ारा हो सके। एक दिन न जाने क्या हुआ कि अचानक यह ‘संत’ मालिक दीपू के पिता से नाराज़ हो गया। उसका कहना है कि किसी ने उसके खिलाफ मालिक के कान भरे होंगे क्योंकि उसने ऐसा कुछ नहीं किया था कि कोई इतना नाराज़ हो जाए। नतीजा: मालिक ने उसे नौकरी से निकाल दिया और उन्हें घर छोड़ना पड़ा और जो पैसा, वे सोच रहे थे कि आठ साल से उस ‘संत’ के पास जमा हो रहा है, उन्हें कभी देखने को नहीं मिला! पुलिस के पास जाएँ, अदालत का दरवाजा खटखटाएँ? यह उनके लिए कल्पनातीत है-गरीब लोग, जिनके पास रोज़ खाने के लाले पड़ रहे हैं, एक अमीर और बहुत से समर्थकों वाले (पाले हुए गुंडों वाले) दबंग व्यक्ति के सामने खड़ा भी नहीं हो सकता। जी नहीं, इससे कुछ होने-जाने वाला नहीं है।

इस तरह अब वे यहाँ रहने आ गए हैं, एक कमरे में सिर छिपाए, किसी तरह जीवन की गाड़ी घसीटते हुए। उनकी छोटी सी दुकान, जो कि वास्तव में एक टपरा भर है, ठीक नहीं चलती क्योंकि यह जगह ही किसी धंधे के लिए उपयुक्त नहीं है। दीपू के पिता ने, जो थोड़ा-बहुत पैसा उनके पास था, उससे एक साइकिल-रिक्शा खरीदा है-साइकिल, जिसके पीछे माल ढोने के लिए पटियों से तैयार छोटी सी जगह है, जिस पर वह सीमेंट, रेट, ईंटें और दूसरे सामानों की ढुलाई करता है। एक दिन उसने अपना रिक्शा बाहर छोड़ दिया। उससे भयंकर गलती हो गई थी: वह चोरी चला गया।

अब वह एक दूसरा रिक्शा किराए पर लेकर चलाता है, जिससे परिवार की गुज़र-बसर के लिए किसी तरह कुछ कमा-धमा सके। 1000 रुपए यानी लगभग 16 डॉलर प्रतिमाह घर-किराया और उसके बाद राशन-पानी, कपड़े-लत्ते और दूसरे खर्च!

दीपू की दो बहनें पहले ही शादीशुदा हैं। उसका सबसे बड़ा भाई और तीसरी बहन उनके दादा-दादी के पास गाँव में रहते हैं और वहीं स्कूल जाते हैं। उसका दूसरा भाई, गणेश कभी हमारे स्कूल पढ़ने आता था। तीन साल पहले उसने एक सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया। क्यों? क्योंकि वहाँ उसे तीन कक्षा ऊपर दाखिला मिल गया था। लेकिन अब उसका परिवार अपने निर्णय पर अफसोस जताता है-वहाँ वह ठीक से कुछ भी सीख नहीं पाया है!

लेकिन दीपू, जो हमारे स्कूल आकर हमेशा खुश होता है, हमारा स्कूल छोड़ने के बारे में सोचता तक नहीं है। वह अपनी कक्षा का सबसे होनहार विद्यार्थी है और हमेशा दूसरों की सहायता करने को तत्पर रहता है, अपने नोट्स सहपाठियों को दे देता है, जिससे वे उसे घर जाकर ठीक से समझ सकें।

हम आशा करते हैं कि यह शिक्षा उसे अपने परिवार से बेहतर स्थिति में ले जाने में मददगार सिद्ध होगी। अगर आप दीपू जैसे दूसरे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं।

%d bloggers like this:
Skip to toolbar