चैरिटी और उनका गरीबी का प्रदर्शन – 12 अप्रैल 2013

परोपकार

सेवा संगठन चलाना एक शानदार काम है! आप अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इसे समर्पित करते हैं, बहुत दौड़धूप करते हैं, पैसा लगाते हैं, और ज़ाहिर है, बहुत मेहनत से उसे खड़ा करते हैं लेकिन अंततः आप महसूस करते हैं कि आपका सारा त्याग और पुण्य हजारोंगुना होकर आपको वापस प्राप्त होता है! जब आप बच्चों की हंसी देखते हैं, जब आप उनके ठहाके सुनते हैं और सोचते हैं कि कितना कुछ उन्होंने आपके प्रयासों से सीखा और अर्जित किया है तो आपका दिल संतोष से भर जाता है! मगर कभी-कभी ऐसे भी मौके आते हैं जब मुझे कहना पड़ता है कि हमारा काम दूसरे सेवा संगठनों से कुछ अलग है और इसलिए संभव है, कुछ लोगों के लिए उतना आकर्षक भी न हो।

शायद आप जानते हों कि जर्मनी मेरे लिए अपने दूसरे घर जैसा है। मैं वहाँ बहुत घूमा-फिरा हूँ, मेरे बहुत से मित्र वहाँ हैं और मेरी पत्नी भी जर्मन है। हमारा एक जर्मन सेवा संगठन भी है जिसे हमने भारत में स्थित हमारी परियोजनाओं को सहारा देने के लिए और विदेशों में हमारे कार्यक्रम आयोजित करने के उद्देश्य से खड़ा किया था। जिससे कि हमारे मित्र और सहयोगी दूसरों को बता सकें कि वो अपना योगदान हमारी जर्मन संस्था को भी दे सकते हैं। इस प्रकार हमारे एक मित्र को उसके मित्र ने संपर्क किया, जिसकी कंपनी गरीब बच्चों के लिए कुछ दान करना चाहती थी। वह एक बड़ी कंपनी है जिसकी सालाना आमदनी का एक बड़ा हिस्सा चैरिटी हेतु प्रयुक्त होता है। वह संस्था जिसे यह रकम प्राप्त होनी है, उसका चयन एक तरह की प्रतियोगिता के माध्यम से तय होता है। कर्मचारी उस परियोजना के चित्र और विवरण पेश करते हैं जिसे सहायता पहुंचाने में उनकी रुचि होती है और प्रबंधन या मैनेजर तय करते हैं कि अंततः धनराशियाँ किसे प्राप्त होंगी।

खैर, हमारे मित्र के पास तो हर वक़्त हमारे आश्रम के चित्र, ब्रोशर्स (प्रचार पुस्तिकाएँ) होते हैं, वैबसाइट होती है, जिसमें उसके और उसकी पत्नी द्वारा प्रायोजित बच्चों को दिये जाने वाले भोजन की चित्रों सहित जानकारी होती है। जब उसने वह सब अपने मित्र को दिखाया तो वह बोला, "अरे, ये बच्चे तो बढ़िया कपड़े पहने हुए हैं और खुश लग रहे हैं। इसे दिखाकर तुम जीत नहीं पाओगे! तुम फटे कपड़े पहने हुए बच्चों को दिखाओ, जो थोड़ा दुखी और दयनीय लगें!"

जब मेरा मित्र मुझे यह बताने आया तो वह अजीब भ्रांति से ग्रसित था और मुझे विश्वास है, मैंने उसे एक स्पष्ट वाक्य से समझा दिया कि ऐसी स्थिति में उसे क्या कहना चाहिए, ‘उन्हें कह दो कि अगर वे ऐसे ही चित्र देखना चाहते हैं तो अपना पैसा कहीं और दान कर दें! मैं अपने बच्चों के ऐसे चित्र न खुद खींचूँगा न किसी को खींचने दूँगा।’

मैं इस बारे बहुत गंभीर हूँ! मैं आपका पैसा नहीं चाहता! और मैं जानता हूँ यह विचार कहाँ से आता है-सारी बड़ी चैरिटी संस्थाएं भूखे बच्चों की, गंदगी में लिपटे हुए, लगभग नंगे, हड़ियल, चेहरे पर मक्खियाँ भिनभिनाती हुईं और रोते हुए, दयनीय बच्चों की तस्वीरें अपनी वैबसाइट पर लगाते हैं। वे अपने विज्ञापनों और ब्रोशर्स पर ऐसे चित्र लगाते हैं जिससे लोगों के दिल पिघल जाएँ। वे बुरे से बुरा दिखाते हैं, भयावह नज़ारा दिखाना ठीक समझते हैं।

मैं मानता हूँ कि वास्तव में ऐसे डरावने नज़ारे दुनिया में मौजूद हैं पर जिसने भी ऐसी किसी संस्था में काम किया है वह मेरी तरह जानता है कि ये अतिशय गरीबी और दयनीयता का चित्रण है। वे और भी बहुत सा काम करते हैं जिन्हें वे दिखा सकते हैं मगर उनके वे चित्र लोगों को रोने के लिए मजबूर नहीं करते।

मैं बहुत गंभीरता के साथ कहता हूँ कि मैं अपने बच्चों के ऐसे चित्र नहीं ले सकता। नहीं, मैं उन्हें ऐसी हालत में नहीं देखना चाहता और किसी भी हालत में उनके ऐसे चित्रों का प्रदर्शन करना नहीं चाहूँगा। ये मेरे बच्चे हैं और मैं उनका वैसा ही ध्यान रखता हूँ जैसा मैं खुद अपने आपका रखता हूँ। मैं उन्हें अच्छे कपड़े पहनने के लिए देता हूँ, अच्छा खाना देता हूँ और मैं उन्हें वातानुकूलित कमरों में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध कराता हूँ! दान प्राप्त करने की गरज से मैं झूठ का सहारा नहीं ले सकता। ये मेरे बच्चे हैं जो बिल्कुल मेरी ही तरह हैं-खुश, खेलते-कूदते और हँसते-गाते!

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