फटे-पुराने कपड़ों की खरीद-बिक्री करके जीवन यापन करने के लिए मजबूर – 31 जुलाई 2015

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवाना चाहता हूँ! उनके नाम हैं, सुधीर और महक और वे क्रमशः सात और पाँच साल उम्र के हैं।

ये सहोदर वृंदावन के सीमावर्ती इलाके में स्थित एक नई सरकारी कॉलोनी में रहते हैं, जिसे ख़ास तौर पर गरीबों के लिए निर्मित किया गया है। इस कॉलोनी में बहुत सी बहुमंज़िला रिहाइशी इमारतें हैं, जिनमें कुल मिलाकर 700 फ्लैट्स बने हुए हैं। ये फ्लैट्स गरीबों को मुफ़्त उपलब्ध कराए गए हैं और अब वहाँ रहने वालों के पास अपने मकान हो गए हैं और उन्हें मासिक किराया अदा करने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।

पाँच सदस्यों वाले सुधीर के परिवार को उनमें से एक फ्लैट मिल गया। बच्चों के माता-पिता काम की तलाश में बारह साल पहले पास के एक कस्बे से वृंदावन आए थे। उन्हें काम तो मिला पर उसमें उन्हें आशानुरूप सफलता प्राप्त नहीं हुई। इन बीच के सालों में सुधीर का पिता लगातार कोई न कोई काम करता ही रहा लेकिन परिवार के भरण-पोषण के लिए आवश्यक पैसों से ज़्यादा कुछ भी कमा नहीं पाया। परिवार के पास आपातकालीन आकस्मिक खर्चों के लिए कभी कोई रकम नहीं बच पाती! इस तरह सौभाग्य से प्राप्त यह फ्लैट उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है!

हालांकि उनके घर के हमारे दौरे से दो दिन पहले तक उनके टब में पानी नहीं था, भले ही अब जो पानी मिल रहा है, वह भारी, नमकीन पानी है, भले ही कॉलोनी के पीने के पानी के एकमात्र नल पर अपनी बारी के लिए रोज़ लड़ाई-झगड़ा करना पड़ता हो या फिर कहीं बहुत दूर से पानी लाना पड़ता हो, वे अपने घर में प्रसन्न हैं: उनका मकान-किराए का खर्च बच जाता है! यह उनका फ्लैट है, उनकी अपनी मिल्कियत- और भले ही उनकी मासिक आमदनी बहुत कम है, कम से कम रहने के लिए उनके पास घर तो है!

परिवार की कोई स्थिर मासिक आय नहीं है और हर माह उसमें भारी परिवर्तन होता रहता है! अपने भाई के साझे में सुधीर के पिता के पास एक ऑटो रिक्शा है। दोनों मिलकर उसे चलाते हैं: सबेरे से दिन भर तक एक चलाता है तो दूसरा शाम के बाद रात भर। रिक्शे के रखरखाव का और पेट्रोल इत्यादि का खर्च काटकर लाभ को वे आपस में बाँट लेते हैं। क्योंकि इस काम से उन्हें अधिक आमदनी नहीं हो पाती, तीन बच्चों का यह पिता फटे-पुराने कपड़े खरीदता है और फिर उन्हें अच्छी तरह धोकर, प्रेस करके कॉलोनी में ही बेच डालता है। इस व्यवसाय से होने वाली कमाई उसे मिलने वाले पुराने कपड़ों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

उसकी सबसे बड़ी बेटी दस साल की है और एक सस्ते निजी प्राथमिक स्कूल में पढ़ने जाती है। सुधीर भी शुरू में वहीं पढ़ता था लेकिन वहाँ के शिक्षक उसके माता-पिता से हरदम कहते रहते थे कि वह पर्याप्त बुद्धिमान नहीं है और कुछ भी सीख नहीं पाता। उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे, बच्चों की मासिक फीस ही बड़ी मुश्किल से अदा कर पाते थे- लिहाजा उन्होंने सोचा, सुधीर को स्कूल भेजने का कोई अर्थ नहीं है! लेकिन इसी बीच महक के स्कूल जाने की उम्र भी हो गई थी और तभी उसके माता-पिता ने आस-पड़ोस के लोगों से हमारे स्कूल के बारे में सुना। वे बड़े खुश हुए कि क्यों न अब दोनों छोटे बच्चों को हमारे स्कूल में भर्ती करा दिया जाए, जहाँ कोई फीस नहीं देनी पड़ती!

अब पिछले तीन सप्ताह से महक और सुधीर हमारे स्कूल पढ़ने आ रहे हैं और यहाँ अपना समय ख़ुशी-ख़ुशी गुज़ार रहे हैं- जीवन में ऐसी मौज-मस्ती आज तक उन्होंने नहीं की थी! अपेक्षानुरूप, हमें यहाँ सुधीर के बारे में कुछ दूसरा ही सुनने को मिल रहा है: शिक्षिकाएँ बताती हैं कि बालक निश्चित ही सीखने और पढ़ने-लिखने में किसी से कम नहीं है- बशर्ते विषय को मनोरंजक बनाकर पेश किया जाए!

सुधीर और महक जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं। किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें और बच्चों की शिक्षा संबंधी हमारे कार्यक्रम के साथ जुड़कर अपना अमूल्य योगदान दें!

शुक्रिया!

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