एक प्रश्न और उसका उत्तर: गरीबी के बीचोंबीच लगातार इतने समय हम कैसे रह सकते हैं? 11 मार्च 2015

परोपकार

हमारे आश्रम में आने वाले मेहमान अक्सर हमारे स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करते हैं और कल मैंने उनके कुछ अनुभव आपके साथ साझा किए थे। किसी ने पूछा: आप ऐसी गरीबी हर वक़्त देखते कैसे रह सकते हैं? वास्तव में भारत आने वाले कई यात्री हमसे यह सवाल करते हैं। आपको आश्चर्य होगा कि वास्तव में हमारे पास इसका उत्तर मौजूद है।

भारत में गरीब और अमीर के बीच का यह स्वाभाविक अंतर हर वक़्त आपको दिखाई देता रहता है। एक विशाल मंदिर है, जिसे बनाने में गुरु को अपने अनुयायियों से प्राप्त करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं और उस मंदिर के सामने चीथड़ों में गरीब भिखारी हाथ फैलाए खड़े हैं। आप दिल्ली की सड़कों पर घूमिए, किसी भी हाट-बाज़ार या एम्पोरियम से, जहाँ कोई भी वस्तु उससे कम महंगी नहीं है, जितनी वह न्यूयॉर्क या पैरिस में है, ख़रीदारी करके बाहर निकलिए और कोई न कोई बच्चा आपके शर्ट की बाँह खींचते हुए आपसे भीख मांग रहा होगा: मैं भूखा हूँ, कुछ खाने के लिए खरीद दीजिए!

जी हाँ, यहाँ बार-बार आपको गरीबी की याद दिलाई जाती है। निश्चय ही, बच्चों के बीच काम करते हुए हमें हर समय यह देखना पड़ता है और हमें ऐसी बहुत सी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है, जिन्हें फीस लेने वाले स्कूलों को नहीं करना पड़ता। हमें उनके जीवन में आने वाली आर्थिक समस्याओं को जानने का मौका मिलता है और स्वाभाविक ही हमें उनके साथ सहानुभूति होती है।

सर्वप्रथम मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आप धरती के किसी भी कोने में हों, गरीबी हमेशा से है और हर जगह है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप लंदन के किसी पॉश रेस्तराँ में बैठे डिनर ले रहे हैं या मध्य अफ्रीका के किसी शरणार्थी शिविर में पीने का पानी वितरित कर रहे हैं-इस दुनिया में हर स्तर पर गरीबी मौजूद है-ऐसे भी बच्चे हैं, जो भूख से मरे जा रहे हैं, कुछ दूसरे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जा पाते और कुछ और हैं, जो मामूली स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं। तो, आपके भारत आने से गरीबी नहीं बढ़ी है बल्कि अचानक आपको उसकी याद आ गई है, वह पहले से मौजूद थी और अब वह आपके सामने बेहतर तरीके से उजागर हुई है। घर में सोफ़े पर बैठे-बैठे आपको उसकी गंभीरता का पता कभी नहीं चल पाता!

मुख्य बात यह है कि आप उसके बारे में क्या सोचते हैं, कैसा महसूस करते हैं और यहाँ रहते हुए यदि आपके अंतःकरण को उस गरीबी ने छुआ है, अगर उसे देखकर आपके मन में मदद करने की इच्छा जागृत हुई है तो कृपा करके इस इच्छा को अपने घर वापस जाने के बाद भी हमेशा ज़िंदा रखें! इस भावना की दुनिया को सख्त जरूरत है कि सब एक साथ मिलकर उनकी ओर मदद का हाथ बढ़ाएँ, जिन्हें मदद की आवश्यकता है।

और इस प्रश्न का जवाब यह है: हम अच्छा से अच्छा जो कुछ भी कर सकते हैं, करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी मदद कितनी छोटी है लेकिन जब आप कुछ देखते हैं और उससे आपका मन पसीजता है तो मदद करने की कोशिश अवश्य कीजिए, परिवर्तन लाने की कोशिश अवश्य कीजिए, इसके बारे में दूसरों को अवश्य बताइए। मैं जानता हूँ कि कुल गरीब बच्चों की संख्या की तुलना में हमारा स्कूल बहुत छोटा है। बच्चों को भोजन कराने और शिक्षा प्रदान करने का यह एक बहुत छोटा सा प्रयास है, जिससे उन बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके। यदि हमारे स्कूल की तरह और भी कई स्कूल हो जाएँ तो यह बहुत बड़ा काम हो सकता है! आप भी मदद कर सकते हैं-उदाहरणार्थ, एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके!

भले ही आप यहाँ न आ सकें, भले ही आप इन बच्चों की मदद न कर सकें और भले ही आप आर्थिक रूप से इतने सक्षम न हों कि कोई आर्थिक सहयोग कर सकें-फिर भी कोशिश कीजिए कि आपके आसपास मौजूद किसी ज़रूरतमंद की कोई न कोई मदद कर पाएँ। कभी-कभी महज एक मुस्कान, मदद के लिए बढ़ा हुआ एक हाथ और सहानुभूति के कुछ अच्छे शब्द भी इतने कीमती साबित होते हैं कि आप कल्पना नहीं कर सकते!

जब कि दुनिया में बुराई आपको विह्वल किए दे रही है, इस बात पर विचार करें: आप जो भी करते हैं, चाहे वह प्रयास कितना भी छोटा क्यों न हो, कोई न कोई असर अवश्य डालता है!

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