अलग होने के सम्पूर्ण लक्षण, लेकिन नहीं: "सब कुछ ठीक है!" – हमारे स्कूल के बच्चे – 29 मई 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जो पिछले दो सालों से हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं। उनके नाम हैं, राहुल और गोपाल और वे क्रमशः 12 और 10 साल उम्र के हैं।

उनका परिवार आम भारतीय परिवारों की तरह सामान्य, पारंपरिक परिवार नहीं है। जब आप उनके घर पहुँचते हैं तो शुरू में आपको यही लगता है कि यह भी सामान्य भारतीय पारंपरिक परिवार ही होगा क्योंकि आपका स्वागत परंपरागत भारतीय साड़ी में लिपटी, सिन्दूर आदि वैवाहिक निशानियों में सजी, उनकी माँ द्वारा किया जाता है। आपके मन में सबसे पहले यही विचार आता है कि शायद लड़कों का पिता काम पर गया होगा। बल्कि गया ही होता है-मगर लौटकर वह उनके घर नहीं आता बल्कि अपने माता-पिता के घर, 15 किलोमीटर दूर मथुरा चला जाता है।

दो कमरों के मकान में, जिसे राहुल की माँ ने किराए पर लिया है, सिर्फ तीन लोग रहते हैं: वह खुद और उसके दो लड़के। वही उसका किराया अदा करती है, वही भोजन-पानी की व्यवस्था करती है और इस तरह कुल मिलाकर वही घर चलाती है। कैसे और क्यों? चलिए, मैं आपको इस अनोखे परिवार की कहानी सुनाता हूँ।

राहुल और गोपाल की माँ का विवाह 13 साल की उम्र में हो गया था। उसके पिता का देहांत पहले ही हो चुका था इसलिए उसके विवाह की ज़िम्मेदारी उसकी माँ पर आ पड़ी थी। उसने अपने पति का पुश्तैनी मकान बेचकर राहुल की माँ के दहेज़ और दूसरे वैवाहिक खर्चों का प्रबंध किया था। एक साल बाद राहुल का जन्म हुआ और उसके दो साल बाद, जब माँ सिर्फ 16 साल की थी, गोपाल पैदा हो गया।

दो साल और गुज़रे थे कि दोनों बच्चे और माँ घर छोड़कर बच्चों की नानी के यहाँ रहने चले आए। सिर्फ 18 साल की कच्ची उम्र में इस युवा महिला को विवाह के अनुभव के अलावा दो बच्चे पैदा करने और घर से बाहर निकलकर अकेले रहने के कठिन अनुभव से गुज़रना पड़ा।

जब वह कुछ साल तक अपने सास-ससुर के साथ अपने पति के घर में रहती थी, आसपास के लोगों के साथ यानी, पति के माता-पिता, पति का भाई और भाई की पत्नी के साथ उसे बड़े कटु अनुभवों से गुज़रना पड़ा। आखिर उसने घर और पति छोड़ ही दिया। विवाह का बंधन नहीं।

जल्द ही उसने खुद अपना काम शुरू कर दिया और विभिन्न देवताओं की मूर्तियों के वस्त्र बनाकर अपनी माँ की आमदनी में योगदान देने लगी और साथ ही बच्चों की परवरिश भी करने लगी। बच्चों का पिता उनके खर्चों के लिए कोई रकम उसे नहीं देना चाहता था-वह सोचता था कि पत्नी उसके पास वापस आ जाएगी। लेकिन वह वापस नहीं गई। इसके विपरीत, खुद अपने लिए एक मकान किराए पर लेने में सफल हो गई, उसका किराया खुद अदा करती, जब कि उस पर दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी भी आन पड़ी थी। वह अपने काम से अभी 3000 रुपए यानी लगभग 50 डॉलर प्रतिमाह कमा लेती है, बेचने के लिए घर में भी कुछ अतिरिक्त कपड़े सिलती है और बच्चों से भी मदद के लिए कहती है और इस तरह 6-7 सौ रुपए प्रतिमाह की अतिरिक्त आमदनी कर लेती है। 1500 रुपए यानी लगभग 25 डॉलर अपने दो कमरों के किराए के रूप में अदा करने पड़ते हैं। लेकिन उसे गर्व है कि वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ी है और खुद अपना घर चला सकती है, बच्चों का लालन-पालन कर सकती है!

जब हम उससे उसके पति के बारे में पूछते हैं तो वह इस बात पर ज़ोर देकर कहती है कि वह पूरी तरह विवाहित है। “हम लोग अलग नहीं हुए हैं, वह हफ्ते-दो हफ्ते में एक बार अवश्य आता है और सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है!” एक तरह से विवाहित होने का दिखावा! आसपास के लोगों के लिए, जब कि वास्तव में सभी असलियत से वाकिफ हैं!

लेकिन कम से कम उसे अपने दोनों लड़कों की पढ़ाई की चिंता नहीं करनी पड़ती। वे अभी हमारे स्कूल की दूसरी और तीसरी कक्षा में पढ़ रहे हैं और उनके बहुत से मित्र हैं! यहाँ वे शिक्षा के अतिरिक्त मुफ्त भोजन भी पाते हैं, जो कि माँ के लिए बहुत बड़ी आर्थिक सहायता है और यह मदद भविष्य में और भी बड़ी होती चली जाएगी!

आप भी इस परिवार जैसे दूसरे परिवारों की मदद कर सकते हैं। किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें! शुक्रिया।

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