हमारे स्कूल के बच्चे: दुष्ट सौतेली माँ सिर्फ लोक-कथाओं में ही नहीं, वास्तविक जीवन में भी- 2 अगस्त 2013

पिछले हफ्ते जब हम अपने स्कूली बच्चों के घरों के दौरे पर थे तो वृन्दावन की सबसे गरीब रिहायशी बस्ती की तरफ निकल गए जहां हमारे स्कूल के कुछ बच्चे रहते हैं। एक घर से बाहर निकलते हुए हम एक दूसरी गली की तरफ मुड़ना चाहते थे कि तभी हमने कुछ लड़कियों को खेलते देखा जिनमें से एक को हम पहचान गए कि वह हमारे स्कूल की लड़की है। वह तेरह साल की नंदिनी थी जिसने इसी जुलाई से अपने भाई, 12 वर्षीय मोहित के साथ हमारे स्कूल आना शुरू किया था। हमने उससे पूछा कि वह कहाँ रहती है और कहा कि हम उसके घर आना चाहते हैं। हमने उसकी जो प्रतिक्रिया देखी उसकी हमें ज़रा भी कल्पना नहीं थी।

आम तौर पर बच्चे हमें अपने घर ले जाकर खुश होते हैं, लेकिन लग रहा था कि नंदिनी हमें अपने घर ले जाने में हिचकिचा रही है। उसने हमसे कहा अगर हम उसके घर जाएंगे तो उनकी माँ उसकी और उसके भाई की शिकायत करेगी और बाद में उसकी और मोहित की पिटाई होगी। यह पता चलने पर हम रुक गए और उससे अपने घर के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देने के लिए कहा।

नंदिनी और मोहित की सगी माँ दस साल पहले दिवंगत हो चुकी थी। उनकी सबसे छोटी बहन माँ की मृत्यु के बाद से ही माँ के परिवार के साथ रह रही थी। चार साल पहले उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली और कुछ समय बाद उनकी सौतेली माँ ने भी एक लड़की को जन्म दिया था जो अब तीन साल की थी। दोनों बच्चे अपने सौतेली बहन से बहुत प्यार करते हैं मगर सौतेली माँ के साथ उन्हें बड़ी मुश्किलें पेश आ रही थीं। वह उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थी, उनका अपमान करती थी और कई बार मार-पीट भी किया करती थी। इसलिए वे दोनों घर में रहकर खेलना पसंद नहीं करते थे और दिन भर सड़क पर मटरगश्ती करते हुए समय गुजारते थे।

हमने तय किया कि कुछ भी हो, हम उनके परिवार से अवश्य मुलाक़ात करेंगे और उनकी माँ से मिलकर बच्चों के साथ उसके रोज़मर्रा के खराब व्यवहार के बारे में बात करेंगे। उनके घर की तरफ बढ़ते हुए मोहित भी साथ हो लिया और हमने उनसे पूछा कि स्कूल में उन्हें कैसा लगता है। पहले वे दोनों वृन्दावन के ही किसी दूसरे स्कूल में पढ़ने जाया करते थे और इसी साल हमारे स्कूल में दाखिला लिया था क्योंकि उस स्कूल की पढ़ाई का खर्च उनका परिवार नहीं उठा सकता था। सामान्य स्कूलों में मासिक फीस अदा करनी होती है, परीक्षा फीस भी लगती है और वर्दी, कलम, कापियों और किताबों का और कई दूसरे खर्च भी स्वयं ही वहन करने पड़ते हैं। उसके पिता के लिए, जो एक दर्जी के यहाँ सहायक के रूप में नौकरी करता था और महज तीन यू एस डालर यानी लगभग 150 रुपए रोज़ कमाता था, इतना बड़ा खर्च वहन करना संभव नहीं था। इतनी सी कमाई में 5 लोगों का भरण पोषण करना ही उसके लिए मुश्किल था। हमारे स्कूल में प्रवेश लेने की कोई फीस नहीं ली जाती, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उनका पिता उन्हें हमारे स्कूल में भर्ती कराने ले आया था। अभिभावकों के लिए यह आर्थिक सहायता जैसा था और बच्चों के लिए इसमें एक दूसरा लाभ भी था-पिछले स्कूल में उनकी शिक्षकों द्वारा पिटाई की जाती थी जिसकी हमारे यहाँ सख्त मनाही थी। आज भी भारत में स्कूलों में शारीरिक प्रताड़णा एक आम बात है इसलिए हमारे स्कूल में दाखिला हो जाने पर बच्चे बड़े खुश हो जाते हैं कि यहाँ शिक्षक उनकी पिटाई नहीं करेंगे।

जब हम उन बच्चों के घर पहुंचे और उनकी माँ से बात की तो उसने साफ-साफ कहा कि उनके घर का वातावरण बहुत खराब है, बात बात पर गाली-गलौज, तानेबाजी और ज़ोर-ज़बरदस्ती और मारपीट होती रहती है। हमने उससे पूछा कि वह बच्चों को क्यों मारती है तो उसने कहा कि यह तो बहुत ज़रूरी है, वे बहुत शैतान हैं बिना पिटाई के कुछ सुनते ही नहीं। बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के वे कुछ नहीं सीख सकेंगे।

हम जानते हैं कि शारीरिक बल प्रयोग भारत में सामान्य सी बात है। फिर भी या शायद इसी कारण से हमने उनकी माँ से लंबी बातचीत की और उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि वह उन्हें मारा-पीटा न करे। हमने उसे बहुत समझाया-बुझाया, डराया-धमकाया भी। हम महसूस करते हैं कि अपने स्कूल में हम नंदिनी और मोहित को अपने घर से दूर एक सुरक्षित और सभ्य घर उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं जहां हिंसा का नामोनिशान नहीं है और अपने प्रयासों से हम ऐसे परिवारों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि कुछ समय बाद इन बच्चों के माँ-बाप भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की कोशिश करेंगे और उनके परिवार में भी एक शांतिपूर्ण वातावरण की स्थापना होगी।

अगर आप भी इस महत्वपूर्ण कार्य में हमारी सहायता करना चाहते हैं तो एक गरीब बच्चे की शिक्षा प्रायोजित कर सकते हैं या बच्चों के एक दिन के खाने का खर्च वहन करके इस सामाजिक कार्य में सहभागी हो सकते हैं।

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