आज मैं आपका परिचय एक ऐसी लड़की से कराना चाहता हूँ जिसका नाम ममता है और जिसने पैदा होने के बाद से ही अपने परिवार को बहुत बुरी आर्थिक परिस्थिति में देखा है। लेकिन उसने बहुत कठिन जीवन जीने के बावजूद अपने चेहरे की मुस्कान को कभी लुप्त होने नहीं दिया।
ममता तेरह साल की है। उसकी दो बहनें और दो भाई हैं और वह अपने माता-पिता की तीसरी संतान है। उसकी सबसे बड़ी बहन का विवाह हो चुका है और वह सास-ससुर के साथ रहती है। उसका बड़ा भाई सत्रह साल का है और जब हम उसके घर गए तब वह घर पर नहीं था, काम पर गया था।
ममता की माँ ने बताया कि उनका परिवार दो साल पहले फिरोजाबाद से वृन्दावन आया है। फिरोजाबाद काँच पर की जाने वाली बारीक, जटिल और बेहद खूबसूरत कारीगरी (पच्चीकारी) के लिए मशहूर है और वृन्दावन से काफी बड़ा शहर है। उस शहर के कारीगर काँच की बहुत आकर्षक सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं। वे फर्नीचर आदि को काँच से सजाने का काम करते हैं और जेवरात भी बनाते हैं। लेकिन यहाँ की सबसे लोकप्रिय वस्तु चूड़ियाँ हैं। फीरोजाबाद में तैयार काँच की चूड़ियाँ दुनिया भर में मशहूर हैं और ममता के पिता इन्हीं चूड़ियों को बेचने का काम करते थे। उसे लगा कि फिरोज़ाबाद में सेल्समैन बहुत ज़्यादा हो गए हैं इसलिए वहाँ उसका धंधा नहीं चल रहा है। जब धंधा इतना मंदा हो गया कि अपने परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल हो गया तो उसने एक मुश्किल फैसला लिया: अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर और साथ में एक बड़े पुट्ठे के डिब्बे में फीरोजाबादी चूड़ियाँ लादकर वह वृन्दावन आ गया।
पहले साल लगा कि उनका निर्णय ठीक था। उसने एक लकड़ी का ठेला खरीद लिया और उस पर चूड़ियाँ रखकर वह गलियों-मुहल्लों में उन्हें बेचने निकल जाता। खासकर उत्सवों के दौरान उसकी अच्छी बिक्री हो जाती थी और अपने घर का किराया और खाने-कपड़े का खर्च वह निकाल लिया करता था।
लेकिन धीरे-धीरे उसका धंधा यहाँ भी मंदा होता चला गया और पर्याप्त आमदनी होना बंद हो गयी। इस तरह, चूड़ियों का धंधा ममता के पिताजी को रास नहीं आया और उसका परिवार फिर से आर्थिक तंगी में फंस गया। उन्हें अपना दो कमरों का घर छोड़ना पड़ा और छोटे से एक कमरे के मकान में स्थानांतरित हो जाना पड़ा। ममता के सबसे बड़े भाई ने मजदूरी करना शुरू कर दिया। आज भी सिर्फ उसकी आमदनी के कारण ही घर चल पाता है। उसके पिता ने अब चूड़ियों के स्थान पर फल बेचने का धंधा शुरू किया है मगर इस धंधे में भी वह बहुत कम रुपया कमा पाता है। उन्हें उम्मीद है कि इस एक कमरे के घर में वे आगे भी रह लेंगे मगर उनकी माँ इस बात से बहुत परेशान रहती है। अपनी हालत पर उसे तरस आता है और वह बहुत तनाव में रहती है मगर वह कर भी क्या सकती है! चार साल के छोटे लड़के और सात और तेरह साल की दो लड़कियों की देखभाल के बाद उसके पास इतना समय ही नहीं होता कि वह कोई काम कर सके।
इन सबके बीच भी ममता के चेहरे पर आप हर वक्त हंसी देखेंगे। वह अपने परिवार की कठिन आर्थिक परिस्थिति के विषय में जानती है, अपनी क्षमता के अनुरूप घर के कामों में और दोनों छोटे बच्चों को संभालने में वह अपनी माँ की मदद भी करती है। लेकिन इतना करने के बाद वह अपनी हंसी के लिए समय भी निकाल लेती है और कारण भी ढूंढ़ ही लेती है। "मैं स्कूल जाना पसंद करती हूँ", वह कहती है। वह हमें अपने बहुत से दोस्तों के बारे में और उनके साथ की जाने वाली मौज-मस्ती के बारे में बताती है।
एक साल से वह हमारे स्कूल में पढ़ रही है और उसने यहाँ बहुत कुछ सीखा है। उसके लिए पढ़ना हमेशा इतना आसान नहीं था, खासकर गणित विषय में, कक्षा में पढ़ाए जा रहे सबक से वह बार-बार पिछड़ जाती थी। लेकिन अब वह इसमें सुधार कर रही है और तेज़ी के साथ सीख रही है। और सबसे अच्छी बात: यह सब सीखने के लिए उसके परिवार को कोई खर्च नहीं उठाना पड़ता।
यही कारण है कि ममता की माँ ने हमसे कहा कि ममता की छोटी बहन, साधना को भी हम अपने स्कूल में भर्ती कर लें। स्कूल शुरू हो गए हैं और जितनी भर्तियाँ की जानी थीं, हो चुकी हैं, इसलिए कुछ मुश्किल तो थी। लेकिन हमने कहा कि हम अपनी शिक्षिकाओं से बात करेंगे कि कोई न कोई रास्ता निकालकर साधना को भी भर्ती कर लें। सोमवार से, संभव है, वह पहली कक्षा में पढ़ना शुरू कर देगी।
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