एक पुरोहित, एक शिक्षक और घर में फूटी कौड़ी तक नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 जुलाई 2014

आज मैं आपका परिचय 6 साल की प्रियंका से करवाना चाहता हूँ। वह पिछले साल से हमारे स्कूल पढ़ने आ रही है और अपर के जी में पढ़ रही है। लोअर के जी छोड़कर उसने हमारे यहाँ सीधे इसी कक्षा से पढाई शुरू की है। इस पर हमें कोई आश्चर्य नहीं है: उसकी माँ बी एड पास है और शिक्षा का मूल्य अच्छी तरह पहचानती है। स्वाभाविक ही उसने अपनी बच्ची को घर में ही काफी कुछ पढ़ा रखा है।

आप पूछेंगे, एक पढ़ी-लिखी शिक्षिका की बेटी हमारे स्कूल में क्यों पढ़ रही है। कारण बहुत साधारण सा है: उसकी माँ किसी स्कूल में अपने लिए कोई नौकरी नहीं खोज पाई। इस इलाके में स्कूल तो बहुत हैं लेकिन प्रियंका की माँ ने बहुत पहले पढ़ाई की थी और आजकल नई-नई डिग्रियाँ लिए हुए लोगों को भी नौकरी मिलना मुश्किल होता है-बी एड किए हुए लोगों की संख्या बहुत बढ़ चुकी है और लगातार बढ़ती ही जा रही है!

इस तरह प्रियंका का पिता पाँच सदस्यों के उस परिवार में अकेला कमाने वाला है। वह भी उस रोज़गार में लगा हुआ है, जिसमें इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि माह के अंत में जेब में पैसों की कुछ बचत हो ही जाएगी। वह धर्मोपदेशक और पुरोहित है और धार्मिक व्याख्यान देकर, धर्मग्रंथों का पाठ करके और विभिन्न अवसरों पर घरों में कुछ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराके अपना और अपने परिवार का खर्च चलाता है।

यह उसका पुश्तैनी काम है। उसका पिता यही काम करता था और उसी से बेटे ने यह काम सीखा है। मूलतः वे लोग जिस जगह के रहने वाले हैं वहाँ यहाँ से आधे दिन की यात्रा के बाद ही पहुँचा जा सकता है मगर क्योंकि वृन्दावन धार्मिक कार्यक्रमों और आयोजनों की सबसे बड़ी नगरी है, प्रियंका के दादा कई साल पहले यहाँ आकर बस गए थे। उसने यहाँ पाँच कमरों वाला एक मकान बनवाया था, जहाँ अब अपनी पत्नी के साथ वह खुद और अपने-अपने परिवारों के साथ उसके दो बेटे निवास करते हैं।

प्रियंका के पिता के लिए इसका अर्थ यह है कि उसे कोई किराया अदा नहीं करना पड़ता। यह एक तरह की राहत है क्योंकि उसकी कमाई से बिजली-पानी का खर्च, राशन और दो लड़कों की पढ़ाई का खर्च भी बड़ी मुश्किल से निकल पाता है। अक्सर बच्चों के लिए राशन खरीदने के लिए भी उसे या तो अपने पिता पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर आस-पड़ोस के लोगों से उधार माँगना पड़ता है।

इसलिए जब प्रियंका को स्कूल भेजने का समय आया तो उसके परिवार के सामने यह प्रश्न उपस्थित हो गया: वे शिक्षा का महत्व तो समझते थे मगर वे यह भी जानते थे कि उनके लिए एक और बच्चे की वर्दियों, किताब-कापियों और उसकी स्कूल की फीस का खर्च वहन कर पाना संभव नहीं होगा! जब उन्होंने सुना कि उनके एक पड़ोसी का लड़का हमारे स्कूल में पढ़ने के लिए आता है तो उन्हें इसमें आशा की किरण दिखाई दी! हो सकता है उनकी बेटी भी वहाँ पढ़ सके!

पिछले साल वे बिल्कुल ठीक समय पर दाखिले के लिए हमारे यहाँ आ गए और इस तरह अब प्रियंका हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा ग्रहण कर रही है! शिक्षिकाएँ उससे बहुत अधिक खुश हैं क्योंकि वह बहुत प्रतिभाशाली लड़की है। इसके अलावा वह कक्षा में बहुत एकाग्र होकर पढ़ाई करती है और जो भी गृहकार्य दिया जाता है, उसे पूरा करके लाती है! हम जानते हैं कि अगर प्रियंका अपनी पढ़ाई जारी रखती है तो वह अपने परिवार के किसी भी सदस्य से अधिक तरक्की करेगी। शिक्षा उसके उज्ज्वल भविष्य के द्वार खोलेगी।

हमारी मदद कीजिए कि हम और भी कई बच्चों के उज्जवल भविष्य के द्वार खोल सकें! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!

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