गरीब परिवार और पर्याप्त बड़ा घर मगर सिर्फ अस्थाई रूप से ही – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 जून 2014

परोपकार

आज मैं आपका परिचय विक्रांत से करवाना चाहता हूँ, जो दस साल का है और हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। एक बार मैंने आपको बताया था कि इन सभी गरीब परिवारों की कोई न कोई कहानी है या कहें कि वे ऐसी परिस्थितियों में रह रहे हैं, जो आपको अचानक अमीरी का और भाग्यशाली होने का एहसास करा देती हैं कि हमारे पास जो भी है बहुत ज़्यादा है। यही हाल विक्रांत के परिवार का है, हालाँकि पहली नज़र में आपको ऐसा नहीं लगेगा।

विक्रांत के घर का प्रवेश-द्वार दूसरे दो घरों की दीवारों के बीच से जाने वाली गली के अंतिम छोर पर स्थित है। आप दरवाज़े तक पहुँचते हैं और सोचते हैं कि अन्दर कोई छोटा सा सँकरा कमरा होगा या अधिक से अधिक कुछ अतिरिक्त जगह निकालने के उद्देश्य से बनाई गई ऊपर जाने वाली सीढ़ी होगी। लेकिन अन्दर प्रवेश करने पर आप जो देखते हैं उससे यही अनुमान लगाया जा सकता है कि परिवार की हालत बहुत ज़्यादा खराब नहीं है! अन्दर एक बहुत बड़ा हाल है, बाईं तरफ दो कमरे हैं, एक रसोई है और उसके आगे एक छोटी सीढ़ी चढ़ने पर तीन और कमरे हैं।

हम पूछते हैं, क्या यह तुम्हारा घर है? विक्रांत की माँ, जो बहुत खुशमिजाज़ और जीवंत महिला है, जवाब देती है कि हाँ, हमारा ही है। सिर्फ तुम्हारा है या आप लोग उसे तुम्हारे पति के भाइयों के साथ साझा करते हैं? 'जी, हमारा तो सिर्फ ये कमरा है'-वह बाईं तरफ वाले पहले कमरे की तरफ इशारा करती है। दूसरा कमरा उसके पति के बड़े भाई का है, जो फ़िलहाल, पिछले कुछ महीनों से दिल्ली में कोई रोज़गार कर रहा है। हम पूछते हैं: 'और बाकी का घर'? तो वह उस छोटी सीढ़ी की ओर इशारा करती है, जिसके बाद दूसरे कमरे और रसोई आदि हैं। हमें पता चलता है कि सीढियों के आगे असल में एक बिल्कुल अलग मकान है, जो किसी अमीर व्यक्ति का है और जो फ़िलहाल वहाँ नहीं रहता। जब वह यहाँ रहने आ जाएगा तो वहाँ दीवार उठाकर उसे अलग कर लेगा। तब तक उन्हें रसोई और दूसरे कमरों को इस्तेमाल करने की इजाज़त मिल गई है, बशर्ते वे सब कुछ साफ़-सुथरा रखें।

इस तरह विक्रांत, उसके माता-पिता और दो भाई उस बड़े से घर में रह रहे हैं मगर हर वक़्त उन पर एक कमरे में सिमट जाने का खतरा मंडराता रहता है। वैसे भी एक कमरे में अब भी उनके परिवार का एक सदस्य रहता है। जब उस दूसरे घर का मालिक आ जाएगा तब बीच में दीवार खड़ी कर दी जाएगी और तब उनके पास रहने के लिए इतनी जगह उपलब्ध नहीं होगी और उन्हें खाना भी हॉल में बनाना होगा। लेकिन तब तक वे खुश हैं कि वे फ़िलहाल पूरी जगह का इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

विक्रांत का पिता शहर की एक छोटी सी कंपनी में श्रमिक है और 55 $ यानी लगभग 3000 ₹ प्रति माह कमाता है। इतनी आमदनी में भी उसने अपने बड़े बेटे को एक निजी स्कूल में पढ़ने भेजा है मगर उसे समझ में आ गया है कि अपने दो छोटे बेटों को वह उसी स्कूल में भेजने का खर्च वहन नहीं कर सकता। इसीलिए विक्रांत अब हमारे स्कूल में पढ़ने आता है और अगले साल से उसका छोटा भाई भी यहीं पढ़ेगा।

विक्रांत तीसरी कक्षा में पढ़ता है। वह पढ़ाई में अच्छा है मगर बहुत शैतानियाँ भी करता है इसलिए उसकी शिक्षिकाएँ उससे बहुत परेशान रहती हैं। लेकिन सभी जानते हैं कि एक दस साल के बच्चे के लिए यह बहुत स्वाभाविक बात है और आने वाले वर्षों में हम उसके विकास को लेकर काफी आशान्वित हैं!

अगर आप चाहते हैं कि विक्रांत जैसे दूसरे बच्चे भी हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा और भोजन पा सकें और इस दिशा में आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करें या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन कर लें तो हमें खुशी होगी!

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