हमारे स्कूल के बच्चे: अत्याचारी पिता के दूसरी औरत के साथ भाग जाने के बाद एक अकेली औरत और उसके चार बच्चे 19 जुलाई 2013

परोपकार

आज मैं आपका परिचय एक ऐसी लड़की से कराना चाहता हूँ जो तीन साल से हमारे स्कूल में पढ़ रही है: राधिका, जो ग्यारह साल की है और अभी दूसरी कक्षा की पढ़ाई कर रही है। हमारे स्कूल के सभी दूसरे बच्चों की तरह वह भी एक गरीब परिवार से आई है और दूसरे सभी परिवारों की तरह इस परिवार के साथ भी एक दुखद कहानी जुड़ी हुई है।

राधिका के माता-पिता का विवाह 1994 में वृन्दावन के पास स्थित एक गाँव में हुआ था। उसकी माँ, मीना ने हमें बताया कि अभी पाँच साल पहले ही वे वृन्दावन आए थे जब उसके पति को, जो मजदूरी करता था, लगा कि वृन्दावन एक प्रगति करता हुआ कस्बा है जहां बहुत सारे निर्माण कार्य चल रहे हैं और मजदूरों की हरदम आवश्यकता बनी रहती है। वह यहाँ निर्मित हो रहे बहुत सारे मंचों (स्टेज) के लिए, जिनमें स्टेज के निर्माण के अलावा बहुत सा सामान भी इधर से उधर ले जाना पड़ता था, मजदूरी करने लगा।

इस बीच उनके चार बच्चे हो चुके थे, दो लड़के और दो लड़कियां। वृन्दावन आने के बाद उन्होंने अपनी बचत से एक घर खरीद लिया। उसे उन्होंने मीना के नाम पर खरीदा था। पति का काम ठीक चल रहा था और हालांकि, आमदनी बहुत ज़्यादा नहीं थी, वह इतनी अवश्य थी कि वे अपनी गृहस्थी का ज़रूरी सामान खरीद सकें, बच्चों को स्कूल भिजवा सकें और बिना किसी बड़ी तकलीफ के जीवन गुज़ार सकें। उनकी दूसरे मजदूर परिवारों के साथ और स्टेज पर काम करने वाले कुछ लोगों से मित्रता हो गई थी। मीना खुश थी और उसे लगता था कि वृन्दावन आना एक अच्छा निर्णय था।

मगर उसका ऐसा खयाल बहुत दीर्घजीवी नहीं रहा। एक दिन उसका पति एक औरत को लेकर आया और कहा कि वह भी भविष्य में उनके साथ ही रहेगी। मीना के लिए यह अविश्वसनीय था और उसने बिफरकर कहा कि तुम जिसके साथ रहना चाहो, रहो, लेकिन अगर वह इस घर में आई तो तुम्हें मेरे बच्चों को पालने के लिए पर्याप्त धन देना होगा! पति ने उससे कहा कि अगर वह घर बेचने के लिए तैयार हो जाए तभी वह पैसे देगा जिससे वह अलग घर खरीद सकेगी और वह भी कोई दूसरा घर अपने और अपनी नई प्रेमिका के लिए खरीद लेगा। यह लिखना और पढ़ना बहुत शांतिपूर्ण लग सकता है मगर यह वार्तालाप कई दिनों के अंतराल में फैला हुआ है, जिसमें बार बार उनके बीच होने वाली लड़ाइयाँ शामिल हैं जो अक्सर काफी हिंसक भी हो जाया करती थीं। अब मीना अपने पति को पहचान ही नहीं पाती थी। वह अपने काम से लौटकर घर आता था, मीना के साथ उसकी लड़ाई होती थी और वह उसे पीटना शुरू कर देता था। पहले वाला प्रेम खत्म हो गया था और उसकी जगह घृणा ने ले ली थी। और यह सब उसके जीवन में आई उस दूसरी महिला के कारण था!

स्वाभाविक ही, राधिका की माँ ने घर बेचने से मना कर दिया था क्योंकि उसे अपने बच्चों को पालने के लिए हर हाल में सिर पर छत की आवश्यकता थी। पति के साथ रोज़-रोज़ की लड़ाइयों के चलते उसने अपनी दोनों लड़कियों को अपनी बहन के यहाँ रहने भेज दिया था। यह उसने अच्छा किया कि अपने लड़कों को नहीं भेजा। कुछ दिन बाद उनके बीच की मारपीट इतनी बढ़ गई कि एक दिन उसके पति ने उसे एक हॉकी स्टिक से पीटना शुरू कर दिया। उसकी चीखें सुनकर उसके दस और ग्यारह साल के लड़के भागते हुए आए मगर तब तक वह बेहोश होकर फर्श पर पड़ी थी। उसके दोनों बेटों ने अपने बाप से लड़ाई शुरू कर दी और चिल्ला-चिल्लाकर पड़ोसियों को बुला लिया। मीना को फर्श पर पड़ा देखकर उसका पति शायद डर गया था और वहाँ से भाग गया। उनके पड़ोसियों ने उनकी मदद की और उसके परिवार के पास खबर पहुंचाई और मीना को अस्पताल ले गए। उसे दो हफ्ते अस्पताल में रहना पड़ा जहां उसकी चोटों पर टांके लगाए गए, मगर स्पष्ट ही वह सिर्फ शारीरिक रूप से घायल नहीं हुई थी।

यह वाकया तीन साल पहले का है। तब से अब तक मीना को अपने पति के बारे में कोई खबर नहीं है, बच्चों ने भी अपने पिता का नाम तक लेना छोड़ दिया है। उनके पास घर तो है मगर उनका गुज़र-बसर का खर्च मीना के परिवार की सहायता पर निर्भर हो चुका है। शुरू में मीना ने वृन्दावन में स्थित मंदिरों में भगवान् की मूर्तियों के वस्त्र सीकर कुछ पैसे कमाने चाहे मगर उसका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता चला गया। उसकी एक किडनी फेल हो गई और हाथ-पैरों में सूजन आने लगी और वह सिलाई का बारीक काम करने में असमर्थ हो गई। अब तो वह शरीर से इतनी लाचार है कि कोई काम ढूँढना भी उसके लिए असंभव है।

मीना की सबसे बड़ी पुत्री, जो अब सत्रह साल की हो गई है, घर के सारे काम-काज देखती है और बड़ा लड़का स्कूल के बाद छोटे-मोटे काम करके थोड़ा-बहुत कमाने लगा है जो घर-खर्च में बहुत उपयोगी साबित होते हैं। राधिका हमारे स्कूल पढ़ने आती है और जब उसकी माँ अपनी कहानी बता रही थी, स्वाभाविक ही राधिका बहुत गंभीर और अपने सोच में खोई हुई थी। लेकिन जब एक बार हमने स्कूल में गुजरने वाले उसके समय के बारे में उससे पूछा, उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने बहुत सारे मित्र बना लिए हैं और स्कूल आने के लिए वह व्याकुल रहती है और स्कूल में उसका समय बहुत सुखद होता है। यह खुशी की बात है कि राधिका की उम्र की लड़कियां अब शिक्षा का महत्व समझने लगी हैं। वे पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहती हैं जिससे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें, जिससे अपनी माँओं जैसी उनकी हालत कभी न हो।

और हम राधिका जैसी लड़कियों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करके उनके लिए यह संभावना पैदा करने का छोटा सा प्रयत्न कर रहे हैं। अगर बच्चों की सहायता के हमारे इस काम में आप भी सहयोग करना चाहें तो आप भी ऐसा कर सकते हैं: किसी बच्चे की शिक्षा प्रायोजित करके या उनके एक दिन के खाने का खर्च उठाकर!

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