आठ सदस्यों का निर्धन, सुखी परिवार – हमारे स्कूल के बच्चे-14 फरवरी 2014

परोपकार

आज मैं फिर एक बड़े परिवार के साथ आपका परिचय करवाने जा रहा हूँ। परिवार के छः बच्चों में से बड़ी तीन बहनें हमारे स्कूल में पढ़ने आती हैं, जिनके नाम हैं गीता, कविता और रीना और जो क्रमशः बारह, नौ और सात साल की हैं। उनके बाद की चौथी बहन जल्द ही पाँच साल की हो जाएगी और तब इसी साल से वह भी हमारे स्कूल की सबसे निचली कक्षा यानी लोअर केजी में पढ़ने आया करेगी।

यह परिवार एक बार फिर इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि भारतीय अभिभावक लड़के की चाहत में किस तरह एक के बाद एक बच्चे पैदा करते रहते हैं: इसी चाहत में सबसे बड़ी, गीता सहित उनकी भी चार लड़कियां हो गईं तब जाकर दो लड़के पैदा हुए। बच्चों की माँ साफ कहती है कि उनके इतने सारे बच्चे सिर्फ इसलिए हो गए क्योंकि पहली चार लड़कियां पैदा वे सब इस बात पर हँसती हैं और हालांकि लड़कियों से सब प्यार का बरताव करते हैं और उनके साथ कोई भेदभाव नहीं बरतते लेकिन अब लड़कियां इस बात को समझने लगी हैं कि उनके अभिभावकों को उनके मुक़ाबले भाइयों की चाहत ज़्यादा थी।

माता-पिता, छः बच्चों, दो भैंसों, एक पाड़े और एक बछड़े के साथ छोटे से मकान में रहते हुए जगह की बड़ी तंगी हो जाती है। दो साल पहले तक वे अपने पिता के भाइयों और उनके बाल-बच्चों के साथ संयुक्त परिवार में रहा करते थे। मगर फिर परिवार के सदस्यों के बीच लड़ाई-झगड़े शुरू हो गए और वे सब संपत्ति का बंटवारा करके अलग हो गए। इमारत को प्रवेशद्वार के साथ ही दीवारें खड़ी करके एक-एक कमरे के तीन अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया। अब सबके पास एक-एक कमरा है और उन कमरों की तरफ जाता हुआ लंबा गलियारा। उसी गलियारे में गीता के परिवार ने भैंसों के कुनबे के लिए भी आश्रय-स्थल बना लिया है।

भैंसें इतना दूध देती हैं कि परिवार के लिए काफी होता है मगर सिर्फ दूध पीकर जीवन नहीं काटा जा सकता और खाने-पीने के लिए और भी चीजों की ज़रूरत होती है, जिसके इंतज़ाम में पिता की आमदनी का ज़्यादातर हिस्सा खर्च हो जाता है। उनका पिता सुबह से अपनी भैंसगाड़ी लेकर बाहर निकल जाता है और निर्माण स्थलों पर ईंटें ढोने का काम करता है मगर इस काम में नियमित और निश्चित आमदनी नहीं हो पाती। भाग्य अच्छा रहा तो माल-ढुलाई के कई चक्कर लग जाते हैं मगर भाग्य हमेशा इतना अच्छा नहीं होता। परिवार की आमदनी इसी पर निर्भर है इसलिए रोज़ ही काम की तलाश में उसे भटकना पड़ता है।

उसकी पत्नी बताती है कि अक्सर घर खर्च के लिए पर्याप्त आमदनी हो ही जाती है मगर कभी-कभी उसके पति को अपने भाइयों से उधार भी लेना पड़ जाता है, विशेषकर तब जब उसका पति खांसी की स्थायी तकलीफ से पीड़ित होता है। बचपन में उसके गले में कोई चीज़ अटक गई थी और शायद वह वहीं पड़ी रह गई। फिर उसके ऊपर ऊतक (टिश्यू) पनप गए और अब उस स्थान पर उसे खुजली होती है जो बाद में तीव्र खांसी के रूप में अक्सर परेशान करती रहती है। उसने डॉक्टरों से अपने गले की जांच करवाई है और वे कहते हैं कि इसका कोई इलाज नहीं हो सकता, बचपन में ही इसका इलाज करवाना ज़रूरी था।

उनके साथ हुई बातचीत के दौरान पूरे समय वे खुश नज़र आए और अपनी कठिनाइयों को भी हँसते हुए बताते रहे जैसे न सिर्फ उन्होंने कष्ट की इस नियति को स्वीकार कर लिया है बल्कि खुशी-खुशी उनका बखान करते हुए उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। कुछ ऐसा ही मिजाज हमने हमारे स्कूल आने वाली तीनों लड़कियों में भी पाया: हमेशा हँसती-खिलखिलाती और प्रसन्न। उनके शिक्षक बताते हैं कि तीनों लड़कियां पढ़ाई में भी ठीक हैं और सभी कक्षा में मन लगाकर पढ़ती हैं।

हमने देखा है कि छुट्टियों के दिन भी वे तीनों बहनें खाना खाने आश्रम आ जाती हैं और साथ में अपने सबसे छोटे भाई तक को ले आती हैं। उनके अभिभावकों का उन्हें यहाँ भेजने का मुख्य कारण यहाँ मिलने वाला मुफ्त भोजन ही है। इसलिए हम उन्हें अच्छी तरह खाना खिलाते हैं, उन्हें मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं और इस तरह अपने बच्चों का लालन-पालन करने में इस गरीब परिवार की मदद करते हैं।

अगर आप हमारे इस काम में अपना सहयोग देना चाहते हैं तो आप एक बच्चे को प्रायोजित करके, बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके या कोई भी राशि दान करके ऐसा कर सकते हैं।

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