काम? जी हाँ, मगर सिर्फ तभी, जब बिजली उपलब्ध हो! – हमारे स्कूल के बच्चे- 23 अगस्त 2013

परोपकार

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल के एक नए लड़के से कराना चाहता हूँ: टिंकू। वह आठ साल का है और हमारे स्कूल के एलकेजी, लोअर किंडर-गार्टन में पढ़ता है, जिसे पूर्व-प्राथमिक स्कूल की पहली कक्षा भी कह सकते हैं और जहां बच्चे अक्षर और कुछ गिनतियाँ लिखना, पढ़ना सीखते हैं और ऊपर की कक्षा-यूकेजी और पहली कक्षा में जाने की तैयारी करते हैं।

टिंकू के पड़ोस में रहने वाले बहुत से बच्चे भी हमारे स्कूल पढ़ने आते हैं और हमें जानते हैं, इसलिए जब हम उसके घर की ओर जा रहे थे तो बहुत से बच्चों ने हमारा अभिवादन किया। वहाँ हम उसकी माँ, ग्यारह साल की उसकी बहन और बारह साल के उसके भाई से मिले।

टिंकू के पिता काम पर गए थे। वे एक केबल बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं-और हालांकि उसका परिवार खुश है कि उनके पास रोजगार है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें नियमित आमदनी होती है। वे 200 प्रतिदिन कमाते हैं, जो कि लगभग 3 डॉलर के बराबर होता है। लेकिन वह तभी काम कर सकता है, जब वहाँ बिजली होती है! जब बिजली नहीं होती तब फैक्ट्री अपने कामगारों के लिए दरवाजे बंद कर देती है और किसी को भी पैसे प्राप्त नहीं होते।

लगातार बिजली आपूर्ति वाले देश में रहने वाले किसी विदेशी को यह अजीब लग सकता है। लेकिन भारत में यह असामान्य नहीं है, खासकर ग्रामीण इलाकों में, कि कई-कई दिन बिजली न हो। सौभाग्य से हम ऐसे किसी स्थान में नहीं रहते और हमारे यहाँ यह कभी-कभार ही होता है कि कुछ घंटों से ज़्यादा के लिए बिजली गुल हो जाए। इसके अलावा हमारे आश्रम में, कभी-कभार होने वाली बिजली कटौती के दौरान बिजली आपूर्ति के लिए कई बैटरियाँ लगी हुई हैं। लेकिन एक फैक्ट्री मालिक को यह अवश्य सोचना होगा कि क्या वह अपने मजदूरों को पूरे दिन का वेतन दे, जब कि वे बिजली की कटौती के चलते सिर्फ आधा दिन ही काम कर पाएँगे! वे अपनी विशालकाय मशीनों को बैटरियों पर नहीं चला सकते और इसलिए वे अपने मजदूरों की छुट्टी कर देते हैं। टिंकू की माँ ने बताया कि विशेषकर गर्मी के महीनों में कई बार ऐसा होता है कि माह में कुछ दिन ही काम मिल पाता है-और टिंकू के पिता कुछ दिनों का वेतन ही घर ला पाते हैं।

फिर भी, यह बात बहुत मानी नहीं रखती कि वह कितना कमाते हैं या बिल्कुल नहीं कमाते-बात यह है कि उन्हें अपने दो बड़े बच्चों के स्कूल की फीस अदा करनी ही होती है, उनके लिए भोजन और कपड़ों की व्यवस्था करनी होती है। इसके अलावा कई दूसरे घरेलू खर्च होते हैं, उन्हें पूरा करना पड़ता है और हाँ, घर का किराया, 500 रुपए हर माह अदा करना पड़ता है। मकान मालिक अपने दो छोटे-छोटे कमरों और रसोई का इतना किराया वसूल करता है। तीसरा कमरा, जो इसी घर का हिस्सा है, अधूरा पड़ा है और ऊपर, छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ और छत भी नहीं बने हैं। सामने घर का प्रवेश द्वार है लेकिन उसमें दरवाजा नहीं है! हर शाम या जब भी बाहर जाना होता है, उन्हें हर कमरे में अलग-अलग ताला लगाना पड़ता है!

घर का किराया और परिवार के भोजन आदि का खर्च पूरा करने के लिए उन्हें अपने परिवार के दूसरे लोगों से, जैसे टिंकू की मौसी से कर्ज़ लेना पड़ता है, जो पड़ोस में ही रहती है और जिसका एक लड़का भी हमारे स्कूल में ही पढ़ता है। तो एक तरफ, आसपास रहने वाले लोगों की, उनके पास एक अतिरिक्त सहायता है और दूसरी तरफ वे इस बात से भी खुश हैं कि अपने एक और बच्चे की फीस देने की उन्हें ज़रूरत नहीं पड़ती!

टिंकू एक खुशमिजाज़ लड़का है और स्कूल के शिक्षकों को विश्वास है कि हमारे स्कूल में वह बहुत जल्द बहुत कुछ सीख लेगा। जबकि वह खुद यह समझता है कि उतना उसने सीख ही लिया है। स्वाभाविक ही उसके बहुत से दोस्त हैं, जिनमें से अधिकतर उसके घर के करीब ही निवास करते हैं!

यह बहुत खुशी की बात है कि ये बच्चे खेलने के साथ-साथ सीखते भी हैं। अगर आप चाहें तो आप भी उनकी शिक्षा के मद में, किसी एक बच्चे की शिक्षा या बच्चो के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके अपना योगदान दे सकते हैं!

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