बारह लोगों का घर मगर कोई काम नहीं, आमदनी नहीं! 27 दिसंबर 2013

परोपकार

आज मैं आपको छठवीं कक्षा में पढ़ रही एक लड़की से मिलवाना चाहता हूँ: डॉली सिर्फ ग्यारह साल की है और हमारे स्कूल की आखिरी, यानी छठवी कक्षा की सबसे कम उम्र की विद्यार्थी है।

डॉली का घर ढूँढ़ना आसान नहीं था। हमारे स्कूल की विद्यार्थी और उसकी मित्र की मदद से ही हम बाज़ार में एक संकरी गली में स्थित उसके घर तक पहुँच पाए। उसका छोटा सा घर दूसरे घरों की दीवारों के बीच इस तरह फंसा हुआ है कि एक पतले रास्ते से ही उसके दरवाजे तक पहुंचा जा सकता है। स्वाभाविक ही, आपके प्रवेश करते समय बिजली गुल हो, जो कि, विशेषकर ठंड में अक्सर रहती ही है, तो निचली मंज़िल पर स्थित उनके घर में घुप्प अंधेरा होता है। उन्हें अपना सामान ढूंढ़ने के लिए भी मोमबत्ती जलानी पड़ती है।

इसलिए अपना ज़्यादातर समय वे ऊपर की मंज़िल पर ही बिताते हैं, या तो छोटे से आँगन में या फिर उस कमरे में, जहां डॉली की चाची रहती है। वहाँ भी सबका समाना मुश्किल होता है: इस छोटे से घर में बारह लोग रहते हैं; डॉली, उसके तीन भाई, उसके माता-पिता, घर की मालकिन उसकी नानी, माँ की बहन, उसका पति और उनके तीन बच्चे।

इतने लोगों के साथ रहने की ऐसी परेशानी देखकर कोई भी समझ सकता है कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। मकान उनका है मगर परिवार में कई तरह के दूसरे खर्चे भी तो लगे रहते हैं। डॉली का पिता बढ़ई का काम जानता है और अक्सर किसी ठेकेदार के साथ दैनिक वेतन पर काम करता है, जिससे उसे रोजाना चार यूएस डालर यानी 250 रुपए के आसपास मिल जाते हैं। अक्सर आजकल उसे काम भी नहीं मिल पा रहा है और दिन भर वह किसी ऐसे ठेकेदार की खोज में लगा रहता है, जिसे बढ़ई की ज़रूरत हो। वे काम न मिलने का सादा सा एकमात्र कारण बताते हैं: बाहर से आए हुए बहुत से बढ़ई कम मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार रहते हैं!

डॉली को इसीलिए इस साल स्कूल बदलना पड़ा। हालांकि पहले वह अपने भाई की तरह एक सस्ते स्कूल में ही पढ़ती थी मगर उनका परिवार स्कूल फीस, किताबें और लिखने-पढ़ने की दूसरी चीजों का भारी खर्च उठाने में असमर्थ था! अब वह हमारे स्कूल में है, जहां परिवार को उसकी सारी पढ़ाई और रोज़ मिलने वाले गर्मागर्म खाने का कोई खर्च अदा नहीं करना पड़ता।

स्वाभाविक ही ऐसे स्कूल से, जहां सारे विषय हिन्दी में पढ़ाए जाते हैं, स्थानांतरित होकर आए विद्यार्थियों को ऐसे स्कूल में, जहां बच्चों की पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम में होती है, थोड़ी दिक्कत तो होती ही है। इसलिए डॉली को भी शुरू में थोड़ी बहुत दिक्कत हुई। लेकिन जल्द ही उसने पढ़ाई में रफ्तार पकड़ ली और अब वह अंग्रेज़ी में भी सारे विषय अच्छी तरह समझ लेती है।

हम कामना करते हैं कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक हो जाए। हमें आशा है कि उसके पिता को जल्द ही कोई अच्छा काम मिल जाएगा और वह अच्छी तरह से अपने परिवार की देखभाल करने में समर्थ होगा। हम उसकी बेटी की पढ़ाई में मदद करते रहेंगे, अन्यथा पैसे की कमी के चलते उसकी पढ़ाई बंद हो सकती है।

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