फ्लैट स्क्रीन टीवी तो है मगर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए पैसा नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 3 अक्टूबर 2014

परोपकार

आज मैं आपका परिचय एक शर्मीले लड़के से करवाना चाहता हूँ, जिसके दिमाग में बहुत सी शरारतें भरी हुई हैं। उसका नाम मोहित है और वह आठ साल का है लेकिन इसी साल से उसने स्कूल जाना शुरू किया है। वह पहले स्कूल क्यों नहीं जा सका? पैसों की समस्या के चलते।

उनका घर बहुत जर्जर अवस्था में है और जब हम उनसे कारण पूछते हैं तो हमें बताया जाता है कि उन्होंने एक साल पहले कुछ कर्ज़ लिया था और उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा उस कर्ज़ की किश्तें भरने में ही चला जाता है। इतना ही नहीं, बार-बार उन्हें घरेलू खर्चों में मदद के लिए अपने रिश्तेदारों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है।

मोहित का पिता एक पुरोहित है और वृन्दावन में यह धंधा करने वाले हजारों की संख्या में हैं। इतने लोगों की भीड़ जब लोगों के धार्मिक संस्कार और कर्मकांड कराने के लिए मौजूद हो तो ज़ाहिर है कि हर एक को कठोर प्रयास करना पड़ता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसे इस सेवा के लिए चुनें। तो, उनमें से कोई भी काम तो कुछ ज़्यादा नहीं पाते लेकिन ऐसी कोई जगह पाने की अथक कोशिश में जुटे रहते हैं, जहाँ उनकी ज़रुरत हो। मंदिरों में जाकर वे पता करते हैं कि कोई बड़ा समारोह होने जा रहा हो तो वे सहायक के रूप में वहाँ कोई काम कर सकें। वृन्दावन के बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों से मिलकर बात करने वाले वे पहले पुरोहित होते हैं कि उनसे कोई धार्मिक संस्कार करवाना चाहें तो वे तुरंत उपलब्ध हो सकें। स्पष्ट है कि उनके पास नियमित आमदनी का कोई ज़रिया नहीं है। धार्मिक उत्सवों के दौरान वे कुछ ज़्यादा कमा लेते हैं लेकिन बाकी समय वे विभिन्न आश्रमों के चक्कर लगाते रहते हैं कि कुछ रुपयों के बदले वे वहाँ होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में सहायक के रूप में कोई छोटा-मोटा काम कर सकें।

इसलिए मोहित की बड़ी बहन, तीन सहोदरों में सबसे बड़ी, वृन्दावन के एक और चैरिटी स्कूल में पढ़ने जाती है, जहाँ उन्हें कोई फीस नहीं देनी पड़ती। वह एक धार्मिक प्रभाव वाला स्कूल है और वह सिर्फ लड़कियों का स्कूल है। उसका भाई एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्हें स्कूल फीस नहीं देनी पड़ती मगर दूसरे खर्च तो होते ही हैं: किताब-कापियाँ, टिफिन-कम्पास बॉक्स, वर्दी और बहुत सी दूसरी चीजें। इसके अतिरिक्त वहाँ की पढ़ाई का स्तर बहुत नीचा है और होमवर्क करके न लाने पर या शैतानी करने पर बच्चों की पिटाई भी की जाती है।

लड़कों को, एक लड़के को भी, निजी स्कूल में, जहाँ वे कुछ ठीकठाक पढ़ाई कर सकें, भर्ती कराने के लिए आवश्यक पैसे अभिभावकों के पास कभी नहीं हो पाते थे। आखिर जब उन्होंने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो राहत की साँस ली: एक जगह, जहाँ उनका बेटा मुफ्त पढ़ सकेगा और स्कूल में उसे मार भी नहीं खानी पड़ेगी! वह बारहखड़ी जानता था, अपने बड़े भाई से उसने और भी बहुत कुछ सीख रखा था और इसलिए वह आज भी बड़ा प्रसन्न रहता है कि अपने सहपाठियों से पहले से ही वह कुछ आगे है।

एक बात और, जिसे देखकर हम आश्चर्यचकित रह गए, यह थी कि जब हम मोहित के घर गए तो लकड़ी के पल्ले की बगल में, जिस पर बच्चे सोते हैं, खिड़की के नीचे, अखबार से ढँका एक बड़ा सा सूराख है, जहाँ एक बड़ा सा फ्लैट टीवी रखा था! माँ से पूछा कि यह कहाँ से आया? इतना खर्च करने की उनकी हैसियत नहीं थी। टीवी उसके पति के एक धनी यजमान ने उपहार स्वरुप दिया था। एक श्रद्धालु व्यक्ति, जिसके यहाँ कभी उसने कोई धार्मिक कर्मकांड किया था। स्वाभाविक ही, उस सेठ ने यही सोचा होगा कि इस गरीब ब्राह्मण परिवार के लिए महंगा फ्लैट टीवी बहुत आवश्यक है!

लेकिन हमारा विश्वास यह है कि बच्चों के लिए शिक्षा अधिक आवश्यक है, जिससे उनका भविष्य उनके वर्त्तमान से बेहतर हो सके!

अगर आप हमारे इस प्रयास में सहभागी होना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को या स्कूल के सारे बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें, आपके सहयोग का स्वागत करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी!

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