आज मैं एक नई लेखमाला शुरू करने जा रहा हूँ जो बहुत दिनों से हमारे दिमाग में थी मगर किसी न किसी कारण से पिछड़ती चली गई: हम अपने स्कूल के बच्चों का परिचय आपसे करवाना चाहते हैं! स्कूल का नया सत्र 1 जुलाई 2013 से शुरू हो चुका है और हर साल की तरह हमने अपने बच्चों के घरों में जाकर उन्हें नजदीक से देखने और जानने का कार्य शुरू कर दिया है। इस बार हमने उनके घरों के चित्रों के साथ कुछ विडियो भी तैयार करना शुरू किया है जिससे आप न सिर्फ उनके बारे में पढ़ सकेंगे बल्कि चित्रों और वीडियो के माध्यम से यह भी जान सकेंगे कि हमारे बच्चे कौन हैं तथा वे और उनके परिवार कैसे रहते और गुज़र-बसर करते हैं।
हम शुरू करते हैं शिवम और कन्हैया से, जो क्रमशः 10 और 9 साल के हैं और जिन्हें आप ऊपर दिये गए चित्र में अपनी माँ के साथ खड़ा देख रहे हैं। यह महिला 25 साल पहले अपने पति के साथ वृन्दावन आई थी। यहीं उनके पाँच बच्चों का जन्म हुआ, जिनमे तीन लड़के थे और दो लड़कियां। उसका पति सड़क के किनारे चाट का ठेला लगाकर खाने-पीने की वस्तुएँ बेचता था और वह इस धंधे से होने वाली थोड़ी सी आमदनी में किसी तरह सात लोगों के परिवार का लालन-पालन करती थी। पैसे की तंगी थी मगर वे अपनी बड़ी लड़की के विवाह के लिए कुछ न कुछ बचत कर ही लेते थे। यहाँ तक कि उन्होंने दूसरी बेटी के विवाह के लिए भी वर की तलाश कर ली थी, जो सिर्फ 14 साल की थी मगर उसे वे विवाह योग्य समझते थे।
लेकिन उसके बाद अचानक जैसे उन पर किस्मत की गाज गिरी हो, शिवम के पिताजी बीमार पड़ गए। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें पीलिया हो गया है और इलाज शुरू कर दिया। इलाज इस गरीब परिवार के लिए बहुत महंगा था और सारा रुपया इलाज में और महंगी दवाइयों, विभिन्न जाँचों वगैरह में खर्च हो गया। इसके बावजूद वे अपनी लड़कियों के विवाह की तैयारियां करते रहे और विवाह में होने वाली रस्मों की धूम-धाम भी शुरू हो गई। लेकिन दुर्भाग्य से विवाह के 20 दिन पहले, शिवम और कन्हैया के पिता का देहांत हो गया।
उसकी मृत्यु ने सारे परिवार के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। अब 13 दिन तक चलने वाली गमी का समय था और उसके सात दिन बाद विवाह का समारोह! लेकिन अब विवाह की खुशियों पर दुख और आंसुओं का साया पड़ चुका था। बड़ा लड़का छठी कक्षा तक किसी स्कूल में पढ़ने के बाद, स्कूल में बार-बार होने वाली पिटाई के चलते, पढ़ाई छोड़ चुका था। वह यहाँ-वहाँ कुछ मामूली काम किया करता था मगर अब उस पर परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी आ पड़ी थी, खासकर दोनों छोटे भाइयों की।
अब 21 साल की उम्र में वह और उसकी माँ मिलकर हर माह 3000 रुपए कमाते हैं। वे एक घर में, एक परिवार के यहाँ काम करते हैं; लड़का रसोई के काम में मदद करता है और वह घर की सफाई करती है। उसी घर में उस परिवार वालों ने एक कमरे में उनके रहने की व्यवस्था कर दी है और जो पैसा वे कमाते हैं, यानी 50 अमरीकी डॉलर, उसे अपने चार लोगों के परिवार के भोजन, कपड़ों और दूसरी आवश्यक वस्तुओं के इंतज़ाम में खर्च करते हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं बच पाता कि दोनों छोटे भाइयों को किसी स्कूल में पढ़ा सके और वहाँ की फीस, पुस्तकों, यूनिफ़ोर्म, कापी-पेंसिल आदि का खर्च वहन कर सकें।
तो ऐसी विषम परिस्थिति में दो साल पहले वह परिश्रमी महिला हमारे स्कूल आई और निवेदन किया कि हम उसके बच्चों को स्कूल में जगह दें, और उनकी शिक्षा की व्यवस्था करें। तब से वे हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं। दोनों ही दूसरी कक्षा में हैं और इस पढ़ाई पर उनकी माँ को अपनी अल्प आय में से निकालकर कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। दोपहर को उन्हें गरम खाना मिलता है और इस तरह उनकी माँ को बच्चों के भोजन की फिक्र नहीं करनी पड़ती।
खुद अपढ़ होते हुए भी वह पढ़ाई की अहमियत जानती है। अभी से उसे अपनी चिट्ठियाँ पढ़ने या लिखने के लिए किसी पड़ोसी की मदद नहीं लेनी पड़ती-उसके दोनों बच्चे अब यह कर सकते हैं। उसे आशा है कि हमारे यहाँ पढ़कर उसके बच्चे निकट भविष्य में कोई न कोई नौकरी पा जाएंगे।
पिछले दो वर्षों में हमने इन दोनो बच्चों को बढ़ते और तरक्की करते हुए देखा है। अपने स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ हम उनका भी पूरा ख्याल रखते हैं। आप भी हमारे इस कार्य में सहायता कर सकते हैं। आप भी शिवम या कन्हैया के आर्थिक संरक्षक (स्पॉन्सर) बन सकते हैं और इस तरह उनकी और उन जैसे बहुत से परिवारों की मदद में हमारे सहभागी बन सकते हैं।
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