सात लोगों का विशाल परिवार और रहने के लिए सिर्फ एक कमरा – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 अगस्त 2014

आज मैं आपका परिचय शैलेन्द्र से करवाना चाहता हूँ, जिसने आठ साल की उम्र से हमारे स्कूल आना शुरू किया था।

शैलेन्द्र, जो अब नौ साल का है, बच्चों में सबसे बड़ा है। सात और चार साल की उसकी दो बहनें हैं और उससे दो छोटे भाई हैं, एक अढ़ाई साल का और दूसरा तीन माह का। दरअसल हम लोग उस परिवार से मिलने तीन माह पहले गए थे और उनकी माँ को और अभी कुछ दिन पहले ही जन्मे बच्चे को देखा था, जो उस समय सो रहा था। शैलेन्द्र की दादी भी उस समय विशेष रूप से माँ और बच्चे की देखभाल के लिए आई हुई थी और उन दोनों के अलावा चार दूसरे बच्चों की देखभाल करती थी, खाना बनाती थी और ठण्ड का मौसम होने के कारण, कमरे को गर्म रखने का काम भी करती थी।

इस तरह हम जानते थे कि वे लोग बहुत गरीब हैं और परिवार के सातों लोग किसी तरह एक छोटे से कमरे में रहने के लिए मजबूर हैं। शैलेन्द्र का पिता सहायक रसोइया है। यह ऐसा काम है, जिसमें नियमित रोज़गार मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। उत्सवों, विवाहों के समय उसे रोज़ काम मिल जाता है और उस वक़्त वह रोज़ पाँच डॉलर तक कमा लेता है। बाकी दिनों में अगर सप्ताहांत में या कभी आधे दिन का भी रोज़गार मिल जाए तो बड़ी बात होती है। ऐसे मौकों पर ज़्यादा तो नहीं, फिर भी कुछ न कुछ थोड़ी-बहुत कमाई तो हो ही जाती है!

जिस ज़मीन पर उनका मकान बना है वह शैलेंद्र के दादा की मिल्कियत है। इसका अर्थ यह हुआ कि जब यह ज़मीन और मकान अगली पीढ़ी को स्थानांतरित होगा, शैलेंद्र के चाचा भी ज़मीन पर अपना हक़ जताएँगे और अपने हिस्से का दावा पेश करेंगे। शैलेंद्र की माँ अभी से इसका प्रतिवाद करने लगी है और इस बात को ज़ोर देकर कहती है कि घर के बगल वाली ज़मीन पर पानी और धूप से बचाव के लिए टीन की छत उन्होंने ही डलवाई है। उसके कहने का अर्थ यह है कि वह उनकी मिल्कियत है।

पहले उनका एक खेत भी था मगर अब वह यमुना नदी की बाढ़ में बह चुका है यानी यमुना नदी का पाट बदलने से यमुना नदी में समा गया है। इस तरह सारे परिवार का खर्च चलाने की ज़िम्मेदारी अकेले शैलेंद्र के पिता पर आ गई है।

स्पष्ट है कि सामान्यतः बच्चों के लिए स्कूल की पढ़ाई असंभव ही थी। बच्चों के भोजन और कपड़ों-लत्तों का खर्च ही इतना हो जाता है कि उनके स्कूलों की फीस, किताबें-कापियाँ और पेन-पेंसिल खरीदना उनके बस का नहीं है। इसीलिए जब उन्होंने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो बड़े खुश हुए और शैलेंद्र को यहाँ भर्ती करा दिया।

पिछले साल उसने लिखना और पढ़ना सीख लिया है और हम आशा करते हैं कि हमारे यहाँ रहकर वह भविष्य में अधिक से अधिक सफलता प्राप्त कर सकेगा।

शैलेंद्र जैसे दूसरे और भी बच्चों की आप मदद कर सकते हैं! एक बच्चे या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप हमारे इस अभिनव सामाजिक कार्य में सहायक और सहभागी हो सकते हैं!

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