पत्नी को पीटने वाले शराबी बाप ने 9 साल तक अपनी बेटी को स्कूल भी नहीं भेजा – हमारे स्कूल के बच्चे- 24 अक्टूबर 2014

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज फिर शुक्रवार है और अपने स्कूल के किसी बच्चे से आपको मिलवाने का दिन। आज फिर एक ऐसे बच्चे की बारी है जिसे, उम्र के हिसाब से, चौथी कक्षा में होना चाहिए मगर जो अभी सबसे निचली कक्षा में पढ़ रही है! वह एक लड़की है, नौ साल की शालिनी।

शालिनी अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी है और अपने माँ-बाप, दो भाइयों और एक बहन के साथ वृन्दावन के पुराने इलाके में रहती है। वे एक चार कमरों के मकान के एक कमरे में रहते हैं, जो निचली मंज़िल पर है और उसकी दीवारें चारों तरफ से दूसरे कमरों की दीवारों से इस तरह से घिरी हैं कि दिन में भी सूरज का उजाला उनके कमरे तक नहीं पहुँच पाता। बाकी के तीन कमरे शालिनी के चाचाओं के कब्जे में हैं, जहाँ वे सब अपने-अपने परिवारों के साथ रहते हैं।

उनके बीच इसी तरह से संपत्ति का बंटवारा हुआ है, जिसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी भाई अपना-अपना कमाएँगे और अपने बलबूते पर अपने-अपने परिवार का भरण-पोषण करेंगे। दुर्भाग्य से शालिनी का पिता अपनी पत्नी और बच्चों को पर्याप्त साधन मुहैया नहीं करा पाता।

वह कढ़ाई करता है और देवताओं की मूर्तियों के कपड़े सीता है। जब हमने शालिनी की माँ से पूछा तो उसने बताया कि वह लगभग 50 रुपए रोज़ ही कमा पाता है, जो एक डॉलर से भी कम होता है! हम विश्वास नहीं कर सके: हम ऐसे मजदूरों तक को जानते हैं, जो इससे छह गुना कमाते हैं! पीछे से एक पड़ोसी ने हमें ऊँची आवाज़ में बताया: वह शराब भी बहुत पीता है! शालिनी की माँ इस बात की ताईद करती है: अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा वह शराब में खर्च कर डालता है। और फिर क्या होता है? शाम को शराब पीकर आता होगा और तुम्हें पीटता होगा? हाँ! और बच्चों को? नहीं, उन्हें वह हाथ नहीं लगाता।

बस इतनी ही इस घर की कहानी है, जिसे पड़ोसियों ने और घरेलू प्रताड़ना की शिकार उस महिला ने बड़ी गंभीरता और सादगी के साथ बिना किसी भावोद्रेक के बयान कर दिया। पति का शराबी होना ही उसके दुख का कारण है, इसी कारण बच्चों को पहनने के लिए ठीक कपड़े नहीं मिल पाते और इसी कारण, जब खाने तक के लाले पड़ जाते हैं, उसे पति के भाइयों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है। वे या तो बच्चों को खाना खिला देते हैं या फिर आटा, दाल, चावल देकर उसकी मदद करते हैं।

लेकिन उनके पास भी इतने पैसे नहीं होते कि बच्चों के स्कूल की फीस भी जमा करा दें! अपने बच्चों के साथ भाई के बच्चों को भी स्कूल भेजें, यह उनके सामर्थ्य से बाहर की बात है। यही कारण है कि नौ साल उम्र हो जाने के बाद भी शालिनी ने स्कूल का मुँह नहीं देखा था।

जिस दिन पहली बार वह स्कूल आई तो बहुत उत्साहित थी। अब उसे स्कूल आते हुए चार माह हो गए हैं और यहाँ आना उसे बहुत भाता है! यहाँ बड़ा मज़ा है, उसने कुछ दोस्त बना लिए हैं और पढ़ना लिखना उसे बहुत अच्छा लगता। हम आशा करते हैं कि भविष्य में उसे एक प्यार करने वाला पति प्राप्त होगा, उसके साथ मार-पीट करने वाला नहीं। उसे ऐसा भविष्य मिलेगा, जिसमें उसे अपने और अपने बच्चों के लिए किसी दूसरे से खाना मांगने की ज़रूरत नहीं होगी।

उस जैसे बच्चों की मदद करने के हमारे काम में आप भी सहभागी हो सकते हैं! एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें! शुक्रिया!