पिछले हफ्ते अपने ब्लॉग में मैंने एक चित्र पोस्ट किया था, जिसमें हमारे स्कूल के बच्चों को दोपहर का भोजन करते हुए दिखाया गया था। फेसबुक पर यह चित्र देखने के बाद एक व्यक्ति ने पूछा कि क्या मेरी बेटी भी इन बच्चों के साथ भोजन करती है। वैसे तो मैंने वहीं उस प्रश्न का उत्तर दे दिया था मगर मुझे लगा कि इस प्रश्न का अधिक विस्तृत जवाब मुझे अपने ब्लॉग के माध्यम से भी देना चाहिए।
इसका सादा सा मूल उत्तर यह है: जी हाँ, बिल्कुल करती है।
दरअसल अपरा तो खाने की छुट्टी का बेसब्री से इंतज़ार करती है कि स्कूल के सारे बच्चे दौड़ते-भागते आएँ और वह उनके साथ बैठकर खाना खा सके। किसके पास बैठे यह वह खुद तय करती है-अक्सर वह आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे के साथ, जो उसके भाई जैसा ही है, खाने बैठती है। दूसरे बच्चों की तरह वह भी अपने लिए एक प्लेट लेती है और वही खाना प्लेट में लेकर खाती है, जो दूसरे बच्चे खाते हैं।
स्वाभाविक ही लोग यह सोचते हैं कि हमारा चैरिटी का काम भी दूसरे कई सामाजिक कार्यों की तरह एक मज़ाक या दिखावा भर है। वे शक करते हैं कि हम इन गरीब बच्चों के लिए तैयार भोजन को इतना अच्छा अवश्य बनाते होंगे कि हमारी बेटी भी उसे खा सके।
शुरू में आपको दुख और आश्चर्य होगा कि कोई ऐसा भी सोच सकता है। लेकिन थोड़ा विचार करने के बाद आपको समझ में आ जाएगा कि ऐसे सोच की जड़ कहाँ है: दुर्भाग्य से बहुत से चैरिटी कार्यों में ठीक यही देखने में आता है! मैं जानता हूँ कि भारत में चैरिटी कार्य एक तरह का संगठित व्यवसाय हो गया है, जहाँ लोग बहुत सा पैसा इकठ्ठा करते हैं और ग़रीबों को खराब, कम गुणवत्ता वाला खाना, कपड़े इत्यादि वितरित करते हैं। फिर अपनी इस तथाकथित चैरिटी का इस्तेमाल अपने विज्ञापनों में करते हैं! वे जानते हैं कि जो खाना वे ग़रीबों को खिला रहे हैं, वह कैसा है और इसलिए उसे न तो वे खुद खाते हैं और न ही अपने बच्चों को खिलाते हैं।
मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ: हम कोई बहुत बड़ा संगठन नहीं हैं। हम एक परिवार हैं, जिसने गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया है और उन बच्चों की मदद करने की कोशिश करते हैं। बच्चों को दिया जाने वाला भोजन हमारी ही रसोई में तैयार किया जाता है। जो रसोइया हमारा खाना पकाता है वही उनका खाना भी पकाता है और उन्हीं सब्ज़ियों, दाल-चावल और आटे का इस्तेमाल करता है; हमारे व्यंजनों में पड़ने वाले मसाले, नमक आदि भी एक ही होते हैं। सिर्फ एक ही अंतर होता है कि 20 के लोगों के मुक़ाबले 200 लोगों का खाना बनाने के लिए काफी बड़े बरतनों का इस्तेमाल किया जाता है।
एक बात और: बच्चों के दोपहर के भोजन के बाद अगर खाना बचा रह जाता है तो रात को हम लोग खुद वही खाना गरम करके खा लेते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि हम खाना बरबाद नहीं करना चाहते और निश्चय ही इसलिए भी नहीं कि उसे खाने वाला और कोई नहीं मिल सकता। जी नहीं, दरअसल इसलिए भी कि वह खाना बड़ा रुचिकर, स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है!
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