नया साल मनाने का अलग तरीका: बेघर लोगों को कम्बल-वितरण – 2 जनवरी 2014

परोपकार

कल और परसों, दो हिस्सों में सन 2013 की समीक्षा करने के पश्चात मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि हमने नए साल का स्वागत किस तरह किया। यह पार्टी नहीं थी फिर भी इसमें बहुत से लोग शामिल हुए। मैं आधी रात को, घड़ी और आकाश चाँद-सितारों को, अंधेरे को नज़रअंदाज़ करता हुआ कड़ाके की ठंड में बाहर निकल पड़ा। फटाखे नहीं छोड़े गए, कोई धूम-धड़ाका नहीं हुआ लेकिन दिल ऊष्म संवेदनाओं से सराबोर था। मैं सेकंडों या मिनटों की नहीं बल्कि कंबलों की गिनती कर रहा था। जी हाँ, हम सब वृन्दावन के बेघर लोगों के बीच कंबल बांटने निकले हुए थे।

हमारे शहर में आजकल कड़ाके की ठंड पड़ रही है। हर साल की तरह, वर्ष परिवर्तन का यह अंतिम सप्ताह, साल का सबसे ठंडा सप्ताह होता है। रात में तो वैसे भी तापमान एक डिग्री तक पहुँच जाता है मगर उस पर यह कि दिन में भी सूरज देखने को नहीं मिलता। इसलिए दिन में भी ठंड से कोई राहत नहीं मिलती-सूरज के बगैर वातावरण और फर्श गर्म कैसे हों और कैसे बाहर रह रहे बेघर लोग 10 डिग्री तापमान में अपनी गुज़र बसर करें! इसके अलावा पिछले दिनों की बारिश ने वातावरण में नमी पैदा कर दी है, जिसके कारण ठंड और ज़्यादा लगती है और ऊपर से जानलेवा ठंडी हवाओं का कहर!

जब कि यहाँ आश्रम में हम लोग रूमहीटर से गर्म किए गए कमरों में दिन गुज़ारते हैं या बाहर आग तापने का आनंद लेते हैं, वहाँ बाहर ऐसे बदनसीब लोग हैं, जिनके सिर पर छत भी नहीं है, गर्म खाने और हीटर की तो बात ही छोड़ दीजिये। अनगिनत ऐसे लोग हैं, फुटपाथ या सड़क ही जिनका घर है, जो धर्मार्थ आश्रमों या मंदिरों में या लंगरों में खाना खाते हैं और जहां जगह मिल जाती है वहीं सिर रखकर सो जाते हैं। उनके पास गर्म कंबल या गद्दे नहीं हैं। वे अपना थोड़ा-बहुत सामान एक गंदी गठरी में लपेट लेते हैं और उसे ही गद्दे या तकिये की तरह इस्तेमाल करते हैं। वे फुटपाथ पर प्लास्टिक शीट फैलाकर उसी पर सो जाते हैं। सपने में भी ठिठुरते रहते हैं।

यह हमारी परम्परा बन चुकी है कि जो भी बन पड़े ग़रीबों के लिए करते हैं: हमने कार में कंबल भर लिए और रात में बेघर लोगों को थोड़ी-बहुत ऊष्मा पहुंचाने निकल पड़े। एक जगह हमने कार रोकी और कंबल निकालकर उन कृतज्ञ गरीबों को ओढ़ाना शुरू कर दिया। औरत, मर्द, बच्चे सभी थे और सभी के चेहरों पर कृतज्ञता थी और ज़बान पर आशीष था। बहुत से लोग सोए हुए थे और बिना उनकी नींद में खलल डाले हमने पास पहुँचकर उन पर कंबल डाल दिये। उन लोगों को, जिनके पास शरीर पर पहने कपड़ों के सिवा कुछ भी नहीं था, सबेरे उठकर वह व्यक्ति, अपने आपको गर्म कंबल ओढ़े देखकर कैसा महसूस करेगा?

एक बार फिर नए साल के स्वागत का यह अनोखा और उपयुक्त तरीका था। उन्हें इस बुरी हालत में रहता देखकर आपको क्षोभ होता है लेकिन उनकी ज़रा सी मदद करके आपके दिल में ऊष्मा का संचार हो जाता है। दूसरों के लिए कुछ करना आपको आंतरिक खुशी से भर देता है।

मैं उन सभी सहयोगियों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ, जिन्होंने हमारे इस कार्य में मदद की। मैं उन्हें भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जो हमारे विभिन्न चेरीटेबल कार्यों में साल भर मदद करते रहते हैं: बच्चों को प्रायोजित करने वाले, भोजन का खर्च वहन करने वाले, सामान्य अंशदाता और वे लोग, जिन्होंने कभी छोटी या बड़ी राशियां देकर हमारी मदद की। आप सभी लोगों ने मेरे और आश्रम परिवार के पिछले वर्ष को इतना सुखद और संतोषप्रद बनाने में अपना योगदान दिया है। इसीलिए मैं आज ये पल आपके साथ साझा करना चाहता हूँ: बच्चों का दुलार, उनके अभिभावकों की मुस्कुराहटें और बेघर गरीबों की कृतज्ञता!

पुनः एक बार धन्यवाद!

यहाँ आप उस रात की फोटो देख सकते हैं

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