आलमारी के रूप में एक टूटा-फूटा फ्रिज – हमारे स्कूल के बच्चे – 25 जुलाई 2014

आज मैं अपने स्कूल के दो लड़कों, भानु और नवीन, से आपका परिचय करवाना चाहता हूँ। ये दोनों भाई पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ पढ़ रहे हैं।

भानु 15 साल का है और हमारे स्कूल की छठी कक्षा में पढ़ रहा है जबकि नवीन की उम्र 13 साल है और वह पाँचवी में पढ़ता है। जब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और भी अधिक खस्ता थी, उनका एक बड़ा भाई भी कुछ समय हमारे आश्रम में रहा करता था मगर अब वह भारत के किसी और इलाके में अपनी चाची के यहाँ रहकर वेल्डिंग का काम सीख रहा है।

भानु और नवीन का पिता राजगीर है और लगभग 110 $ यानी लगभग 6500 ₹ प्रतिमाह कमाता है। वे लोग उसमें से लगभग 25 $ यानी लगभग 1500 ₹ अपने छोटे से घर का किराया चुकाने में खर्च कर देते हैं, जहाँ उनका परिवार पिछले छह माह से रह रहा है। पहले वे जहाँ रहते थे, किराया इस रकम का एक तिहाई था लेकिन मकान मालिक ने उनसे मकान खाली करवा लिया-क्योंकि वह अपना मकान बेचना चाहता था। बच्चे इस नए मकान में खुश हैं: क्योंकि यहाँ घर के सामने बहुत बड़ा आँगन है, जहाँ उन्हें न सिर्फ नहाने का स्थान और संडास उपलब्ध हैं बल्कि खेलने-कूदने, दौड़ने-भागने, लेटने-सोने और पतंग उड़ाने की सुविधा भी उपलब्ध है।

जब हम उनके घर पर नज़र दौडाते हैं तो वहाँ एक रेफ्रिजिरेटर रखा देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं जबकि हमारे स्कूल के एकाध किसी बच्चे का परिवार ही रेफ्रिजिरेटर खरीदने की हैसियत रखता है। हमने पूछा, उनके पास फ्रिज कब से है-और पता चला कि फ्रिज काम ही नहीं करता। दरअसल वह उनके माकन मालिक का फ्रिज है और जब वह खराब हो गया तो उसे फेंकने की जगह उसने उसे घर पर ही पड़ा रहने दिया और यह अच्छा ही रहा क्योंकि यहाँ आने के बाद अब वे उसका इस्तेमाल कर पा रहे हैं-एक आलमारी की तरह!

यह स्पष्ट है कि परिवार के पास कोई ज़्यादा संसाधन नहीं हैं और यह भी कि घर की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए भी उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है जबकि, इन खर्चों के अलावा उन्हें अपने बड़े बेटे को भी कुछ रुपए भेजने पड़ते हैं जिससे उसकी चाची पर उसके खर्च का ज़्यादा बोझ न पड़े। इसके बावजूद हम देखते हैं, और जैसा कि हमने अपने स्कूल के बच्चों के अधिकांश परिवारों के मामले में भी गौर किया है, कि वे लोग अपने सीमित संसाधनों में भी खुश रहते हैं और साथ रहने के आनंद का भरपूर आस्वाद लेते हैं।

भानु और नवीन, दोनों ही पढ़ाई में अच्छे हैं लेकिन उनकी शिक्षिकाएँ दोनों के स्वभाव में काफी अंतर पाती हैं: जबकि भानु को बातें करने में मज़ा आता है और वह काफी मिलनसार भी है, नवीन ज़रा शांत है और काफी सोच-विचारकर ही अपनी बात कहता है।

किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप भानु और नवीन जैसे दूसरे और बच्चों की मदद कर सकते हैं।

Related posts

रोशनी और कृष्णकांत

सिर्फ रहने के स्थान के बदले में दिन भर मजदूरी करना – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों का परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवा रहे हैं। उनकी माँ एक विशाल घर ...
मोनिका

मोनिका अपनी अंतिम बड़ी शल्यक्रिया के लिए तैयार है – 19 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु निकट भविष्य में होने वाली मोनिका की तीसरी शल्यक्रिया के बारे में लिख रहे हैं। मोनिका उनके स्कूल ...
Mohini with her father

जब एक नाई लड़का पैदा करने के चक्कर में पाँच-पाँच बच्चे पैदा कर देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु एक नाई की बेटी, मोहिनी का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जो उनके चैरिटी स्कूल में ...
हर साल घर में पानी घुस जाता है

हर साल घर में पानी घुस जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो सबसे गरीब परिवार से आने वाले बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। हर साल ...
नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं

नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 दिसंबर-2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो बच्चों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं। उनका पिता नाई है और ...
टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके - हमारे स्कूल के बच्चे - 4 दिसंबर 2015

टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने चैरिटी स्कूल की दो लड़कियों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जिनके नाम सुनीता और ...
सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 27 नवंबर 2015

सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल की एक लड़की का परिचय अपने पाठकों से करवाते हुए उसके परिवार की व्यथा-कथा लिख रहे ...
जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया - हमारे स्कूल के बच्चे - 20 नवंबर 2015

जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों से अपने स्कूल के एक लड़के का परिचय करवा रहे हैं, जिसका परिवार बिना बिजली के ...
चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता - हमारे स्कूल के बच्चे - 13 नवंबर 2015

चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता – हमारे स्कूल के बच्चे – 13 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु पाठकों से अपने स्कूल के तीन बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। उनका पिता एक चाय की गुमटी ...
अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 6 नवंबर 2015

अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के एक बच्चे का परिचय करवा रहे हैं, जिसके सहोदर भाई-बहनों के बारे में वे पहले ...

Leave a Reply