छह छोटे-छोटे कमरों में परिवार के 22 सदस्य – हमारे स्कूल के बच्चे – 23 जनवरी 2015

परोपकार

जब हम गौरव के घर पहुँचे तो यह पता ही नहीं चल पा रहा था कि गौरव कहाँ है और दो घरों और एक सायबान के बीचोंबीच स्थित आँगन में घूमती गायों के बीच बैठे हुए ये लोग कौन हैं। बाद में जाकर हमें पता चला कि वे सभी गौरव के, जो 22 सदस्यों के एक संयुक्त परिवार में रहता है, कोई न कोई रिश्तेदार हैं।

वहाँ हर तरफ गाएँ घूम रही थीं और कुछ महिलाएँ, युवक और बच्चे भी थे। एक छोटा बच्चा रो रहा था, कुछ बच्चे एक खाली ट्राली पर चढ़ रहे थे और उस ट्राली के नीचे कोई चीज़ थी जो हिरण जैसी दिखाई दे रही थी और चारा या भूसी खा रही थी। जब हम गौरव का इंतज़ार कर रहे थे कि वह अपनी माँ और भाई-बहनों को बुला लाए, बहुत से दूसरे बच्चों ने हमें घेर लिया।

अंत में सभी थोड़ा शांत हुए और हम गौरव की माँ और उसके चार बच्चों से बात कर पाए। गौरव आठ साल का है-हालांकि उसकी माँ को ठीक-ठीक पता नहीं है। उसकी छोटी बहन सात साल की है, उसके बाद पाँच और तीन साल के दो भाई हैं।

उनका पिता साधारण मजदूर है और जब भी उसे काम मिल जाता है, 200 रुपए यानी लगभग 3 यू एस डॉलर रोज़ कमाता है। स्वभाविक ही, उसे रोज़ काम नहीं मिल पाता लेकिन गौरव की माँ का अंदाज़ा है कि माह में बीस दिन वह कुछ न कुछ कमाकर ले ही आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि महीने भर में वह 4000 रुपए के आसपास यानी लगभग 60 यू एस डॉलर कमा लेता है।

वह इमारत और गायों के बाड़े सहित बड़ा सा आँगन उनके संयुक्त परिवार की संपत्ति है-लेकिन छहों भाइयों को सिर्फ एक-एक कमरा ही मिल पाया है, जिसमें वे अपने-अपने परिवारों के साथ गुज़ारा करते हैं। यही हाल गौरव के पिता का है और इस तरह उनका छह व्यक्तियों का परिवार उस एक कमरे में तीन बिस्तर लगाकर सोता है। दिन में वे बिस्तर गोल करके बाहर रख देते हैं, जिससे कमरे में हिलने-डुलने की कुछ जगह हो जाती है।

परिवार में चार-चार बच्चों का होना यही बताता है कि उन्होंने अपने अनुभव से भी नहीं सीखा कि ज़्यादा बच्चे पैदा करने पर संपत्ति के बटवारे के बाद हर बच्चे को इतना कम मिल पाता है कि गुज़ारा करना भी मुश्किल होता है!

हमने पूछा कि क्या गौरव के भाई-बहन भी स्कूल जाते हैं तो पता चला कि जाते हैं: बहन पूजा, हालांकि गौरव से दो साल छोटी है, एक सरकारी स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है। गौरव हमारे स्कूल में प्राथमिक कक्षा से पहले वाली दूसरी कक्षा यानी के जी 2 में पढ़ता है। और जबकि गौरव अंग्रेज़ी और हिन्दी में अपना नाम लिखना सीख गया है, पूजा अपने नाम के हिज्जे तक नहीं जानती। विभिन्न स्कूलों की शिक्षा के स्तर में यही फर्क है। गौरव के बाद वाला भाई अपने चचेरे भाइयों की तरह एक सस्ते निजी स्कूल में पढ़ता है लेकिन उसकी माँ ने हमसे कहा: "अगर अगले साल आपके स्कूल में स्थान मिल जाए तो मैं सभी तीन बच्चों को आपके यहाँ भेजूँगी!"

गौरव बहुत शरारती लड़का है और दिन भर न सिर्फ कक्षा के बाहर बल्कि कक्षा में भी धींगा-मस्ती करता रहता है। लेकिन उसकी शिक्षिका यह सब मंद-मंद मुसकुराते हुए बताती हैं-वह जानती है कि भले ही उसे पढ़ाना काफी मेहनत का काम है मगर उसका दिमाग काफी तेज़ है और जब पढ़ता है तो जल्द ही सब सीख लेता है!

आप भी हमारे स्कूल के गौरव और दूसरे बच्चों की मदद कर सकते हैं: किसी एक बच्चे को या सभी बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

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