तेरह लोग और रहने के लिए सिर्फ दो कमरे – हमारे स्कूल के बच्चे – 29 अगस्त 2014

परोपकार

आज मैं अपने स्कूल के दो छोटे बच्चों से आपका परिचय करवाना चाहता हूँ, जिनके नाम क्रमशः शशि और हेमंत हैं। वे छोटे लगते हैं मगर उनके अभिभावक बताते हैं कि वे क्रमशः आठ और दस साल के हैं। हमारे स्कूल के दूसरे बच्चों क़ी तरह वे भी गरीब घरों से आते हैं।

उनके घर के पास हमारे स्कूल के दूसरे भी बहुत से बच्चे रहते हैं और जब हम उनके यहाँ गए तो हमें उन बच्चों ने घेर लिया। कुछ देर यह तय करने में ही निकल गए कि उस घर में और उस परिवार के साथ रहने वाले बच्चे कौन हैं और कौन उनके पड़ोसी और मित्र हैं। आखिर हमें शशि और हेमंत मिल ही गए और तब हम उनके अभिभावकों के साथ उनके कमरे में एक खाट पर बैठकर बातचीत कर सके। उनका 13 साल का सबसे बड़ा भाई उस वक़्त घर पर नहीं था।

हमें बताया गया कि घर उनके दादा की मिल्कियत है, जोकि उन्हीं के साथ वहीं रहता है। उसके चार लड़के हैं और सभी वहीं रहते हैं। उनमें से दो की शादी हो चुकी है, जिनमें से एक शशि का पिता है। दूसरे शादीशुदा भाई के भी दो बच्चे हैं-इस तरह कुल मिलाकर वहाँ रहने वाले वे तेरह लोग हैं, जिनके पास दो कमरे, एक छोटी सी रसोई, एक संडास, एक छोटा सा कबाड़ घर, जहाँ वे अपने बैल का चारा वगैरह रखते हैं और एक अंदरूनी दालान है। बस। इतनी सी जगह में वे सभी तेरह लोग रहते हैं, उनका खाना बनता है, वहीं वे भोजन करते हैं, नहाते-धोते हैं और उनके बच्चे वहीं खेलते-कूदते रहते हैं!

इससे ज़्यादा की उनकी हैसियत भी नहीं है। बच्चों का पिता बैलगाड़ी चलाकर लगभग 50 अमेरिकन डॉलर यानी लगभग सिर्फ 3000 ₹ माहवार कमाता है-वह भी तब जब उसका काम-धंधा ठीक चल रहा होता है। जब धंधा मंदा होता है तब आमदनी काफी कम हो जाती है। दूसरे तीनों भाई भी मजदूरी करते हैं और ज़्यादा नहीं कमा पाते। वे सभी अलग-अलग काम करके पैसे कमाते हैं मगर सबकी कमाई सम्मिलित रूप से सारे परिवार पर खर्च की जाती है। इसी तरह वे किसी तरह अपना जीवन यापन कर पाते हैं-अगर वे अलग-अलग रह रहे होते तो सबके लिए यह काफी मुश्किल होता!

यही कारण है कि परिवार अपने बच्चों को कम गुणवत्ता वाले निजी स्कूलों में ही भेज पाते हैं। वे अपने अभिभावकों से सुनते रहे हैं कि सरकारी स्कूलों में सालों पढ़ाई करने के बाद भी बच्चा कुछ भी नहीं सीख पाता, लिहाजा बच्चों की बेहतर पढ़ाई की आशा में वे अपने बच्चों को इन निजी स्कूलों में भेजते हैं। उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते मगर अपनी हैसियत के अनुसार वे बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जल्द ही उन्हें पता चल जाता है कि इन निजी स्कूलों में भी बच्चे ज़्यादा कुछ सीख नहीं रहे हैं।

जब उन्होंने हमारे स्कूल में पढ़ रहे पड़ोसी बच्चों से हमारे स्कूल के बारे में सुना तो शशि को भी हमारे यहाँ भर्ती कराने ले आए। वह पिछले स्कूल में दूसरी कक्षा में थी मगर हमारे यहाँ उसे सबसे निचली कक्षा से शुरू करना पड़ा। लेकिन सिर्फ एक साल हमारे स्कूल में पढ़ते हुए वह इतना कुछ सीख चुकी थी कि उसके परिवार ने अपने लड़के को भी हमारे यहाँ भर्ती कराने का निर्णय किया।

अब हेमंत और शशि दोनों ही अपर के जी यानी हमारे स्कूल की मुख्य कक्षाओं से पहले वाली कक्षा में पढ़ रहे हैं। अब उनके लिए स्कूल का अर्थ यह नहीं कि घंटों बोर होते बैठे रहें जबकि शिक्षक अपनी गप्प बाज़ी में मशगूल हैं या कि होम वर्क करके नहीं लाए तो शिक्षकों से मार खाएँ। अब स्कूल उनके लिए मज़ेदार जगह है, जहाँ वे सुखद वातावरण में पढ़ाई करते हैं-और यही पढ़ाई का सही तरीका है।

शशि और हेमंत जैसे दूसरे बच्चों की मदद के हमारे काम में आप भी सहभागी हो सकते हैं! एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप ऐसा कर सकते हैं!

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