आज रमोना को बच्चों की जानकारियाँ (प्रोफ़ाइल) छांटते समय पता चला कि कुछ बच्चों के सरनेम नहीं हैं। उसने शिक्षिकाओं से पूछा और वे भी किसी बच्चे का सरनेम नहीं जानती थीं। उसने भर्ती रजिस्टर की जांच की तो वहाँ भी उनका कोई ज़िक्र नहीं था। तब जाकर उसने बच्चों से पूछा मगर कुछ बच्चे बता नहीं पाए और कुछ बच्चे बताना नहीं चाहते थे। आखिर उसने पूर्णेन्दु से पूछा और उसने बताते हुए समझाया कि क्यों कुछ बच्चे अपना सरनेम नहीं बताना चाहते।
भारत में समाज का ढांचा ऐसा है कि किसी व्यक्ति का पारिवारिक नाम जातिसूचक होता है और हमारे द्वारा सहायता प्राप्त कई बच्चे गरीब और अपढ़ परिवारों से आते हैं जो कि आम तौर पर किसी न किसी निचली जाति के होते हैं। दुर्भाग्य से समाज के कई तबके इन जातियों को अछूत मानते हैं। यह एक कारण हो सकता है कि अभिभावक अपने बच्चों को अपना आखिरी नाम यानी सरनेम बताने से मना करते हों। वे अपनी जाति से शर्मिंदा तो होते ही हैं शायद डरते भी होंगे कि कहीं उनकी जाति के आधार पर हम उनके बच्चों को स्कूल से निकाल न दें। शायद वे जानते नहीं कि हम इस मानसिकता से कोसों दूर हैं और ऐसा सोच भी नहीं सकते।
मैं जाति प्रथा में विश्वास नहीं करता और इसे भारतीय संस्कृति का सबसे बुरा पक्ष मानता हूँ। हमारे दरवाजे सबके लिए खुले हैं वह चाहे किसी भी जाति का हो या किसी भी धर्म को मनाने वाला हो। मेरे लिए सारे मनुष्य बराबर हैं, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों। मैं बच्चों में ईश्वर को देखता हूँ और मेरी भुजाएँ उन्हें गले लगाने के लिए सदा तत्पर रहती हैं। इस तरह यह बात मेरे लिए कोई मानी नहीं रखतीं कि उनका आखिरी नाम या सरनेम क्या है, लेकिन स्कूल प्रबंधन में इसकी आवश्यकता पड़ती है। इसलिए कल ही हम बच्चों के अभिभावकों से कहेंगे कि हमें प्रबंधन की अपेक्षाओं के चलते आपके बच्चों के आखिरी नामों की आवश्यकता है और यह भी कि उनके बच्चों का यहाँ स्वागत है और उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। यह बेहद दुखद है मगर नियमानुसार आवश्यक है। शायद यह एक उदाहरण भी बन सकता है कि सभी के साथ समान बर्ताव करना ही उचित है। किसी भी बच्चे को दूसरे बच्चों से पढ़ाई का किंचित भी कम अधिकार नहीं है।
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