राजनीतिज्ञ ज़्यादा वोट पाने के लिए जाति प्रथा का उपयोग करते हैं – 10 सितंबर 2010

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कल मैंने ज़िक्र किया था कि भारतीय सरकार जनगणना के पश्चात जाति आधारित एक और गणना करवाने वाली है जिससे पता चल सके कि किस जाति के कितने लोग भारत में निवास करते हैं। हो सकता है कुछ लोग इस बात से अनभिज्ञ हों कि इन आंकड़ों की जानकारी प्राप्त करने में सरकार का क्या उद्देश्य है।

दुर्भाग्य से राजनीतिज्ञ जातिगत भेदभाव की गलत व्यवस्था का लाभ उठाना चाहते हैं। इन आकड़ों के प्राप्त होने पर वे जान सकेंगे कि देश के किस इलाके में कौन सी जाति का बहुमत है। फिर हर पार्टी उन इलाकों का अध्ययन करेंगी और जिस इलाके में ब्राह्मण बहुसंख्यक होंगे वहाँ ब्राह्मण उम्मीदवार खड़े करेंगी। ऐसा करने पर उस व्यक्ति के जीतने की ज़्यादा संभावना होगी क्योंकि वह जाति के आधार पर वोट मांगेगा और निश्चित ही अधिकांश ब्राह्मणों के वोट पाएगा भी। ब्राह्मण की जगह वह किसी निचली जाति का भी हो सकता है। कहने का अर्थ यह है कि उम्मीदवार अपनी जाति के आधार पर वोट मांगेंगे।

भारतीय समाज का ढांचा जाति आधारित है। पश्चिम के लोग समझते हैं कि जाति प्रथा के विरुद्ध कानून तो है फिर ऐसा कैसे होता है। दरअसल कानून जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव को रोकने के लिए है, देश में जाति प्रथा को मानने की, ईश्वरीय आदेश मानकर उस पर विश्वास करने और तदनुसार व्यवहार करने की आज़ादी है! एक दूसरा कानून भी है जो 'अस्पृश्यता' को, अर्थात कुछ लोगों को इतना घृणित समझना कि वे छूने के काबिल भी न हों, खत्म करने के लिए बनाया गया है। लेकिन इन कानूनों के बावजूद जातियाँ अब भी मौजूद हैं। मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि अधिकांश परिवारों में आज भी यह आवश्यक है कि अपने बच्चों के विवाह अपनी ही जाति में किया जाए और निचली जाति के लोगों के साथ एक ही टेबल पर बैठकर खाना न खाया जाए। हमारे विद्यालय में, जहां हम सब साथ-साथ भोजन करते हैं, हम ऐसे सोच के खिलाफ काम करना चाहते हैं!

अब इन राजनीतिज्ञों को देखें! यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों के दिमागों से जाति के विचार को समूल नष्ट करने का प्रयास करें लेकिन इसके स्थान पर वे उनके दिलों में इस बुरे विचार का विष उँड़ेलते रहते हैं। आपको ऐसी शिक्षा देनी चाहिए कि लोग जाति व्यवस्था को भूल जाएँ। आप लोगों के साथ बैठकर भोजन करें और उनसे कहें कि आप किस जाति के हैं उसे भूल जाएँ, सिर्फ यह सोचें कि आप एक मनुष्य हैं।

एक और सवाल मेरे मन में आता है:अगर कोई व्यक्ति मेरे दरवाजे पर आता है और मुझसे मेरी जाति पूछता है तो मैं उससे क्या कहूँगा? अगर मैं उससे कहूँ कि मेरी कोई जाति नहीं है तो वे क्या करेंगे? मैं सिर्फ मनुष्य हूँ, और कुछ नहीं।

आजकल एक बहुत बड़ा वाद-विवाद चल रहा है कि क्यों नहीं सरकार जनगणना के साथ ही जाति आधारित गणना भी करा लेती और क्यों उसे दोबारा कराके इतना पैसा बर्बाद कर रही है। जब उच्चतम न्यायालय ने गरीबी रेखा से नीचे गुज़र-बसर करने वाले परिवारों को और उन लोगों को जिनके पास अनाज खरीदने के लिए पैसा नहीं है, मुफ्त अनाज बांटने का आदेश दिया तो सरकार ने इंकार कर दिया कि इतना खर्च सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती। अपने चुनावों के खेल के लिए, अपनी वोट की राजनीति के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना संभव है, जिसमें हम राजनेताओं को चुनते हैं जिनके लिए हमारे जाति आधारित आंकड़े इकट्ठा करने के लिए पैसा है मगर अपने भूखे वोटरों को भोजन मुहैया करने के लिए नहीं है!

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