राजनेता जातियों के बीच दरार को बढ़ाते हैं – 11 सितंबर 2010

भारतीय समाज में आज भी मौजूद जाति प्रथा के बारे में मैं लिखता रहा हूँ। कल मैंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था कि कैसे जाति के प्रति लोगों की जागरूकता को राजनेताओं का समर्थन प्राप्त है क्योंकि अंततः वह उनके लिए लाभप्रद साबित होता है।

आधिकारिक रूप से वे यह दावा करते हैं कि वे जाति को लेकर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध हैं और कानूनी रूप से किसी को जातिगत नाम से पुकारने की इजाज़त नहीं है। निचली जातियों के लोग शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर पा सकें इस उद्देश्य से कुछ निर्णय लिए गए हैं। सरकारी नौकरियों में और विश्वविद्यालयों में निचली जाति के लोगों के लिए कोटा सुनिश्चित करते हुए आरक्षण लागू किया गया है।

एक तरफ ऐसा लगता है कि वे निचली जातियों के उत्थान के लिए प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी तरफ जातियों के बीच दरार और चौड़ी हो रही है। जब ऊंची जातियों के लोगों के बीच से अधिक योग्य आवेदन-कर्ता होते हैं और निचली जाति के लोगों के भी आवेदन प्राप्त होते हैं तो सरकार यह सुनिश्चित करती है कि पहले निचली जातियों को आरक्षित कोटा पूरा किया जाए। यह मानी नहीं रखता कि निचली जाति वाला कितना अयोग्य है या ऊंची जाति वाला कितना योग्य है। नौकरियों की रिक्तियां या विश्वविद्यालयों की सीटें कोटे के अनुसार पहले भरी जाएंगी और निचली जाति वाले पहले लाभान्वित होंगे।

मैं नहीं समझता कि जाति प्रथा को समाप्त करने का यह कोई ठीक तरीका है। बल्कि नौकरियों कि लिए जाति को आधार बनाते ही आप विभिन्न जातियों के बीच अलगाव पैदा कर देते हैं। इसके अलावा उच्च जाति में जन्म लेने का मतलब यह नहीं होता कि आप अमीर हैं! किसी की आर्थिक हालत से इसका कोई संबंध नहीं होता। तो फिर पढ़ाई का मौका उन्हें क्यों न दिया जाए जो शिक्षा का खर्च खुद नहीं उठा सकते? निचली जाति का सम्पन्न व्यक्ति अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सकता है लेकिन किसी भी जाति के गरीब व्यक्ति के लिए यह मुश्किल होता है और उसे इसके लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ता है। अगर सीटों को भरना ही है तो ज़रूरतमन्द विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों का प्रावधान करें। अगर आप किसी की जाति का पता कर लेते हैं तो किसी की आर्थिक स्थिति का पता भी आप कर सकते हैं। जो ठीक से अपने पैरों पर चल नहीं पा रहे हैं उनके लिए अपना सहयोग का हाथ बढ़ाइए!

मैं महसूस करता हूँ कि राजनीतिज्ञ आम तौर पर जनता के हितैषी नहीं होते। वे सिर्फ अगले चुनावों के बारे में विचार करते हैं। कौन उन्हें वोट देगा यह बात उनके मन पर हावी रहती है और चुनाव जीतने के लिए वे लोगों के बीच अलगाव और आपसी घृणा फैलाने में भी हिचकते नहीं हैं।

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