कई ऐसे संबंध और शादियाँ होती हैं जिसमें उस व्यक्ति पर प्रेम नहीं बरसता जिसे उसके माँ-बाप ने अपने लड़के या लड़की के लिए पसंद किया होता है। स्वाभाविक है कि हर कोई उतना आगे जाकर, जैसा मैंने कल अपने ब्लॉग में वर्णन किया था, अपने बेटे या बेटी की या अपने किसी रिश्तेदार की हत्या नहीं कर सकता। लेकिन ऐसे कई प्रकरण हैं, जहां सिर्फ इसी एक कारण से परिवार ने अपने ही परिवार के सदस्य का परित्याग कर दिया जाता है- और वह कारण है कि उसने अपनी मर्जी से एक 'अनुपयुक्त' व्यक्ति से विवाह करके बहुत बड़ा अनैतिक काम किया है। वह व्यक्ति किसी दूसरे धर्म को मानने वाला भी हो सकता है मगर अधिकतर प्रकरणों में वह दूसरी जाति का होता है।
ऐसा अकसर होता है कि लड़का और लड़की घर से भाग जाते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनके अभिभावक किसी भी सूरत में उनके प्रेम और संबंध को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे कहीं दूर जाकर, छिपकर विवाह कर लेते हैं। कुछ मित्र या हिमायती भी कभी-कभी मौजूद होते हैं। हमने सुना है कि कई प्रकरणों में लड़की के माँ-बाप लड़के के विरुद्ध पुलिस में शिकायत भी दर्ज करा देते हैं कि उसने उनकी लड़की का अपहरण कर लिया है। जब पुलिस उन्हें खोज लेती है तब लड़की बताती है कि वह लड़के से प्रेम करती है और उसके साथ रहना चाहती है। अगर दोनों बालिग हैं तो अभिभावक इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकते।
‘लगभग’ कुछ नहीं कर सकते! सिर्फ एक ही उपाय अपने बच्चों को दंड देने का उनके पास रह जाता है: वे उनसे अपना संबंध विच्छेद कर सकते हैं। वे घोषणा करते हैं, 'मेरी बेटी हमारे लिए मर चुकी है' या 'अब मेरे लड़के का मेरे लिए कोई अस्तित्व नहीं है'। सिर्फ अभिभावक ही नहीं, सारा परिवार इसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।
आप कल्पना कर सकते हैं कि उनके प्रति इस व्यवहार से युवा दंपति को कितना कष्ट होता होगा। वे प्रेम करने लगे, दुनिया का सबसे बेहतरीन एहसास उनके दिलों में था और उन्होंने अपने दिल का कहा मानकर ऐसा किया। अपने दिल का कहा मानने के ‘अपराध’ में उन्हें अपने परिजनों के दिलों से बाहर निकलना पड़ा! वे जो हर कदम पर उनके साथ थे, जिन्हें वे अपने प्राणों से ज़्यादा प्यार करते थे, जिन्होंने उन्हें गोद में खिलाया, जो हर गम और खुशी में उनके साथ थे, अब उनसे कोई मतलब नहीं रखना चाहते, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने किसी के साथ प्रेम किया।
वे अपने परिवार से बेदखल कर दिये गए। इसका अर्थ यह था कि वे अब परिवार के किसी आयोजन में शामिल नहीं हो सकेंगे। वे किसी जन्मदिन पर नहीं बुलाए जाएंगे, शादियों में कोई उनके चेहरे देखना नहीं चाहेगा और परिवार के किसी सदस्य का देहांत हो जाने पर कोई उन्हें यह दुखद समाचार देने की ज़रूरत भी नहीं समझेगा। समाज में अब उनका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।
हमारे यहाँ दो कर्मचारी हैं जो इसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं। उन्होंने प्रेम विवाह किया और अब अपने परिवार से उनका कोई संबंध नहीं रह गया है। अब वे यहाँ काम करते हैं और जीवित रहने के लिए उन्हें किसी और का कोई सहारा नहीं है।
मैं हर अभिभावक से इतना निवेदन करना चाहता हूँ: अपने बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार मत करो! दिमाग खुला रखो और दिल साफ रखो। अपने बच्चे की खुशी को अपनी सभी योजनाओं से ऊपर रखो। आप किसी दूसरे के जीवन की कोई योजना नहीं बना सकते। आपके बच्चे ने एक निर्णय लिया और आपको उस निर्णय का सम्मान करना चाहिए। यथार्थवादी बनिए और देखिये कि आप सिर्फ दुख पैदा कर रहे हैं, अपने लिए भी और बच्चों के लिए भी। आप इतने बहुमूल्य संबंध को ध्वस्त कर रहे हैं। आपका बच्चा, हो सकता है, कुछ समय के लिए दुखी रहे लेकिन कुछ दिन बाद वह भी आपको अपने दिल से निकाल देगा, जैसा आप उसके साथ कर रहे हैं, और फिर उसे भी आपसे कोई मतलब नहीं रह जाएगा। जब आप इतना आगे बढ़ जाते हैं तो संबंधों को सामान्य बना पाना और भी मुश्किल हो जाता है।
मैं यह नहीं कहता कि ऐसा हो ही नहीं सकता। हो सकता है, समय बीतने के साथ यह संभव है कि मनमुटाव समाप्त हो जाए और परिवारों के बीच सामंजस्य हो जाए। लेकिन ज़्यादा समय बीतने के बाद यह होना काफी मुश्किल प्रतीत होता है और अधिकतर प्रकरणों में असंभव। कभी-कभी बहिष्कृत लड़की को घर आने की इजाज़त मिल जाती है और उसे स्वीकार कर लिया जाता है जिससे उसके साथ कभी-कभी संवाद हो सके और संबंध पूरी तरह नहीं तोड़े जाते। लेकिन अक्सर अनचाहे सदस्य को, निचली जाति के भागीदार को, कभी भी घर में दाखिल होने नहीं दिया जाता। यह सभी के लिए एक बहुत मुश्किल परिस्थिति होती है।
तो अपने लिए और अपने चाहने वालों के लिए ऐसी हालत कभी पैदा न करें। इस शर्त के साथ प्रेम न करें कि दूसरे को आपकी इच्छानुसार चलना होगा। अपने बच्चों को स्वीकार करें, उनसे प्रेम करें और उन्हें अपने सपनों के अनुसार जीने की सुविधा प्रदान करें।
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