इन दिनों एक प्रकरण और दो दिन पहले उस पर दिये न्यायालय के फैसले से अखबार भरे पड़े हैं। यह एक महत्वपूर्ण प्रकरण है और स्थानीय मीडिया के लिए विशेष रूप से बहुत दिलचस्प क्योंकि यह मेहराना नामक जगह पर घटित हुआ जो मथुरा जिले का एक गाँव है और इसलिए हमारे लिए अपेक्षाकृत नजदीक है और वह बहुत भीषण अपराध के बारे में है। मगर घटना बीस साल पहले की है।
सन 1991 में एक छोटे से गाँव की एक लड़की अपने पड़ोसी लड़के से प्रेम करने लगी। वे शादी करना चाहते थे मगर एक समस्या थी: वह ऊंची जाति की लड़की थी और लड़का एक नीची जाति में पैदा हुआ था। उनके माँ-बाप कभी उन्हें शादी की इजाजत नहीं दे सकते थे इसलिए दोनों ने एक योजना बनाई। लड़के के चचेरे या फुफेरे भाई की सहायता से वे घर से भाग गए। गाँव गुस्से से पागल हो उठा और अभी उनके बारे में चर्चा थमी नहीं थी कि वे वापस लौट आए, सिर्फ चार दिन बाद।
उन तीन नौजवानों की सज़ा मुकर्रर करने के लिए गाँव की पंचायत बुलाई गई, जो एक तरह से गाँव का न्यायालय जैसा ही होता है। उस चचेरे या फुफेरे भाई की इस मामले में सांठगांठ के बारे में गाँववालों को पहले ही पता चल चुका था और उसका ‘अपराध’ भी दोनों मुख्य पात्रों के बराबर ही माना गया। लड़की ने अपनी और उन तीनों के माध्यम से सारे परिवार की इज्ज़त को दागदार किया था।
इस स्वयंभू न्यायालय में गाँव के पंचों ने, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग थे, निर्णय लिया कि तीनों को फांसी पर लटका दिया जाए। उनका निर्णय उसी वक़्त, उसी स्थान पर अमल में लाया गया। भीड़ ने तीनों युवाओं को निर्दयता के साथ पीटना शुरू कर दिया और यहाँ तक कि उन्हें फांसी पर लटकाने से पहले उस नौजवान के यौनांगों को जलाया गया। वीभत्स अपराध! लड़की के पिता भी इस सम्मान हत्या में शरीक हुए।
उस नौजवान लड़के के चाचा ने इस प्रकरण की जानकारी पुलिस में दी। 54 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और पिछले बीस साल से इस प्रकरण की सुनवाई चलती रही। इन बीस सालों में 13 अपराधी, ज्यादातर अधेड़ और बूढ़े, ‘स्वर्ग’ सिधार चुके थे। बचे हुए लोगों में अधिकतर अब 60 से ऊपर हो गए हैं और कुछ का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। मथुरा न्यायालय ने उनमें से 8 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई है और 27 लोगों को उम्र-कैद।
न्यायालय ने फैसला करने में बहुत देर लगा दी। इन बीस सालों में ये सभी अपराधी बेल पर छूटे हुए थे जबकि उन्हें इस दौरान जेल में होना चाहिए था! जो स्वर्ग सिधार गए उन्हें सज़ा मिल ही नहीं पाई! मुझे मालूम है कि सभी सजायाफ्ता लोग अभी सर्वोच्च न्यायालय में अपील करेंगे और ऐसे प्रकरणों में फांसी की सज़ा आम तौर पर उम्र-कैद में तब्दील कर दी जाती है। इसके बावजूद मुझे खुशी है कि सबसे निचले न्यायालय ने इतनी सख्त सज़ा सुनाई, क्योंकि इससे सारे समाज को एक स्पष्ट संदेश जाता है।
सवाल यह है कि यहाँ सम्मान का अर्थ क्या है? उस लड़के ने उस लड़की के साथ ऐसा क्या किया था कि उसका और उसके परिवार का सब कुछ लुट गया? वह उस लड़की से प्रेम करता था, इतना ही काफी है। प्रेम एक पवित्र एहसास है। वह दूसरे की जाति नहीं देखता। आप किसी के भी प्रेम में पड़ सकते हैं, आप पहले उसकी जाति नहीं पूछते। आपने हजारों प्रकरणों के बारे में सुना होगा जो इससे मिलते जुलते हैं और जो समाज में भेदभाव और उससे संबंधित तथाकथिक ‘सम्मान’ या ‘इज्ज़त’ के लुट जाने के नतीजे में घटित हुए। लोग प्रेम पर बंदिश लगाना चाहते हैं मगर प्रेम किसी बंदिश को नहीं मानता। वह ऊंच नीच नहीं देखता, ऊंची जाति या नीची जाति नहीं देखता। प्रेम के पास सम्मान की अपनी एक अलग ही परिभाषा है।
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