आज मैंने किसी मित्र द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किए गए ये चित्र देखे। ये चित्र हिमाचल प्रदेश के किसी मंदिर के हैं। यह हिमालय की तराई में बसा भारत का खूबसूरत प्रदेश है और सैलानियों के अलावा हर साल हजारों तीर्थयात्री भी यहाँ आते हैं। इसे ‘ईशभूमि’ कहा जाता है। ऊपर दिए गए चित्रों में एक तो मंदिर के प्रवेश-द्वार का है और दूसरा मंदिर से सटे भोजनालय का है।
"शूद्र मंदिर में प्रवेश न करें" और "लंगर हाल में शूद्र प्रवेश न करें"
21वीं सदी के भारत की यह दशा है। हम उन्नति कर रहे हैं, देश अधिकाधिक आधुनिक हो रहा है लेकिन मानसिकता वही प्राचीन और दकियानूसी बनी हुई है।
आप ऐसा लिखने और अपने जैसे ही कुछ लोगों को इन स्थानों में प्रवेश से वंचित रखने और मंदिर में ईश-आराधना करने से रोकने का मकसद जानकार शायद दहल उठेंगे। लेकिन अधिकतर लोग, इतने दिन भारत भ्रमण के बावजूद, शायद न जानते हों कि भारत भर के सारे हिन्दू मंदिरों का यह एक अलिखित नियम है। क्योंकि हर जगह आपको ऐसे सूचनापट्ट नहीं मिलेंगे इसलिए आप जान भले न पाएँ। मगर यह हर भारतीय समझता है।
ये सूचनापट्ट दरअसल जातिगत भेदभाव संबंधी भारतीय कानूनों का उल्लंघन हैं और इन्हें इस तरह प्रदर्शित करना अपराध है। यही कारण है कि बड़े शहरों में निचली जातियों के लोगों को भी आप मंदिर जाते हुए देख सकते हैं। जाति चेहरे से तो पता चलती नहीं इसलिए कोई जान भी नहीं पाता। इसके अलावा पता भी चल जाए तो बड़े शहरों में उसके खिलाफ कुछ करना भी मुश्किल होता है। अगर कोई यह कह दे कि "ऐ, तुम नीची जाति के हो, भीतर नहीं जा सकते." तो यह एक जुर्म होगा और वह व्यक्ति पुलिस के पास चला जाए तो रोकने वाले को दिक्कत हो सकती है।
लेकिन छोटे शहरों में और कस्बों-गावों में हर कोई हर किसी को जानता है और कौन किस जाति का है यह भी। सब जानते हैं कि कौन मंदिर में प्रवेश करने का हकदार है और कौन नहीं। निचली जाति वाले यह सबसे अच्छी तरह से जानते हैं और मंदिरों से चार कदम दूर ही रहते हैं। वे जानते हैं कि अगर उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की जुर्रत की तो सारा गाँव ही उनके खिलाफ हो जाएगा और ऊंची जाति वाले गुस्से में कुछ भी कर सकते हैं, यहाँ तक कि उनकी और उनके परिवार वालों की हत्या भी कर सकते हैं।
मैंने ऊंची जाति वालों को यह कहते सुना है कि धर्मग्रंथों में लिखा है कि निचली जाति में जन्म लेने वालों को, जिन्हें मंदिर में प्रवेश की और वहाँ पूजा-अर्चना करने की इजाज़त नहीं है, सिर्फ मंदिर की चोटी पर रखे कलश को देख भर लेने से ही अच्छे कर्म का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है। यह उन्हें मंदिर प्रवेश से रोकने की सबसे नम्र शैली है। उन्हें मंदिर के बाहरी हिस्सों की सफाई करने का अधिकार है लेकिन अंदर जाने का बिल्कुल नहीं। यह है हिन्दू धर्म और यह जाति प्रथा उसके लिए, सारे समाज के लिए और देश के लिए भी बेहद शर्म की बात है कि यह आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी लोगों के दिमागों में ज़िंदा है। यही कारण है की निचली जातियों के बहुत से लोगों ने धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म अपना लिया है, जिसमें ईश्वर की कोई अवधारणा ही नहीं है। यह वाकई भयानक है कि जाति प्रथा आज भी इतनी ज़्यादा फल-फूल रही है। आप हर जगह जाति प्रथा देख सकते हैं, चाहे वह विवाह की बात हो, चाहे कहीं सामूहिक भोजन का आयोजन हो रहा हो, जहां ऊंची जाति और नीची जाति के लोगों के लिए खाने के अलग-अलग स्थान नियत होते हैं। मैं पहले ही कई बार लिख चुका हूँ कि किस तरह राजनीतिज्ञ इस प्रथा को प्रोत्साहित करते हैं और वे किस तरह जातियों के बीच घृणा फैलाने में कामयाब होते हैं। मैं अपने आपको हर धर्म और हर जाति व्यवस्था के बाहर पाता हूँ। कुछ लोगों को प्रताड़ित करने वाली इस प्रथा के विरुद्ध हम सबको मिलकर काम करना चाहिए, निचली जातियों के लोगों के साथ एक ही पंगत में बैठकर भोजन करना चाहिए और जो लोग यह सोचते हैं कि निचली जाति के लोगों को कुछ कम अधिकार हैं या उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है तो उन लोगों का खुले आम जमकर विरोध करना चाहिए।
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