पिछले हफ्ते मैंने ज़िक्र किया था कि भले ही धर्मग्रंथों के अधिकांश नियम भ्रांति और पागलपन से भरे हुए हों, बहुत से लोग उन पर भरोसा करते हैं और तदनुसार आचरण भी करते हैं। जाति प्रथा ऐसे मूर्खतापूर्ण नियमों का एक उदाहरण है जिसने समाज में गहराई तक पहुंचकर अपनी जड़ें जमा ली हैं और आज भी खूब फल-फूल रही है। कुछ लोग हैं जो दावा करते हैं कि जाति प्रथा अब भारत में अप्रासंगिक हो गई है मगर असलियत कुछ और ही दिखाई देती है। बहुत से लोग आज भी उस पर विश्वास करते हैं और उसी के अनुसार आचरण भी करते हैं। यह समझ पाना कई जगह मुश्किल होता है मगर फिर मैं उनके पाखंड के बारे में सोचकर हैरान रह जाता हूँ।
सामान्यतः लोग जाति के आधार पर बहुत बुरी तरह विभाजित हैं। गावों में आज भी विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग कुएं हैं। उच्च जाति के लोग एक कुएं का पानी पीते हैं तो निचली जातियों के लोगों के कुएं अलग, ज्यादातर सुदूर, गाँव के बाहर स्थित होते हैं या उच्च जातियों के कुओं की तरह सुविधाजनक स्थान पर नहीं होते। अक्सर इस विलगाव के चलते मार-पीट भी होती रहती है। अगर कोई निचली जाति का व्यक्ति उच्च जाति के कुएं से पानी ले लेता है तो वे बड़े क्रोधित हो उठते हैं और सोचते हैं कि उनके कुएं का पानी अपवित्र हो गया।
मैं ऐसे बहुत से ब्राह्मणों को जानता हूँ जो अपने घरों और अपने कार्य-क्षेत्र में जाति प्रथा को बहुत गंभीरता से लेते हैं। वे बहुत दिखावा करते हैं और इस बात का बड़ा ख्याल रखते हैं कि खाने का समान कहाँ से खरीदना, सिर्फ ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करना और अगर कोई ‘अछूत’ छू जाए तो तुरंत घर जाकर स्नान करना!
लेकिन जब वे घर पर नहीं होते तब क्या करते हैं? जब वे बाहर जाते हैं, छुट्टियों में या व्यापार या रोजगार के सिलसिले में? दूसरों की तरह वे किसी होटल में जाकर ही खाना खाते हैं। वे कैसे जानेंगे कि बावर्ची या बैरा किस जाति का है? वे नहीं पूछते, वे परवाह नहीं करते, बिना दिमाग पर बोझ डाले मज़े में खाना खाते हैं। यह बहुत मुमकिन है कि जो बावर्ची अपने हाथों से सब्जियां काटता है वह ‘अछूत’ हो! लेकिन जानने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए न जानकार वे खुश हो लेते हैं और मन को दिलासा देते हैं कि ब्राह्मण ही होगा।
बड़ी परेशानी होती है और कई बार विवाद भी होता है जब उनके कार्यालय में उनका अधिकारी किसी निचली जाति का व्यक्ति होता है! तब उनका सारा जाति आधारित सोच कि कौन ऊंचा है, कौन नीचा है, अचानक चूर-चूर हो जाता है।
आपको पता ही है कि ‘बॉस संस्कृति’ भारत ने अंग्रेजों से प्राप्त की। इंग्लैंड में अब वह उस रूप में मौजूद नहीं है जैसे अतीत में थी मगर भारत में बॉस आज भी श्रेष्ठतम है। पश्चिम में आप देखते हैं कि बॉस साथ काम करने वाले या अपने कनिष्ठ कर्मचारियों के साथ आदर का व्यवहार करता है, बराबरी का व्यवहार करता है। भारत में आप आसानी के साथ देख सकते हैं कि अधिकतर कार्यालयों में एक बॉस, बॉस होता है और सभी दूसरे कर्मचारी उसके सामने सहमे-सहमे से रहते हैं।
अब कल्पना कीजिए कि एक तथाकथित अछूत जाति का व्यक्ति अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर पदोन्नति पा जाता है और बहुत से कर्मचारी उसके नीचे काम करते हैं। उसने अपनी छात्रावस्था में निचली जाति का होने के कारण बहुत भेदभाव सहन किया है। उसे ब्राह्मण बच्चों ने तंग किया है, दूसरी ऊंची जाति वाले बच्चों ने उसकी हंसी उड़ाई है और कुल मिलाकर सबने मिलकर उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है। अब बदला लेने का उसके पास पूरा मौका है। यह बड़ी आसानी के साथ समझ में आने वाली बात है।
मैं यह नहीं कहता कि सब करते हैं, मगर न भी करते हों तो भी उसके नीचे काम करने वाले ब्राह्मण कर्मचारी उसके सामने बहुत विनीत भाव से पेश आएंगे। वे जानते हैं कि अब वही है जो उन्हें पदोन्नति दिला सकता है या रोज़मर्रा के कार्यालयीन मामलों में लाभ पहुंचा सकता है। तो वे उसे ‘सर,सर’ कहते हुए हर वक्त उसकी सेवा-चाकरी में लगे रहेंगे। वे उसके लिए पानी ले आएंगे, वह बैठा हुआ है मगर ये खड़े रहेंगे और चीज़ें लाने ले जाने तक का काम करेंगे भले ही वह निरर्थक हो, भले ही वह उनका काम भी न हो।
तो जब वे कार्यालय में होते हैं वे बड़े मज़े में एक नीची जाति के व्यक्ति के नीचे काम कर सकते हैं लेकिन अपनी जातिवादी मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते! जैसे ही कार्यालय के बाहर कदम रखा वे फिर ब्राह्मण बन जाते हैं।
जब वे वर या वधु की खोज में निकलते हैं, इस बारे में नहीं सोचते कि वे रोज़ ही निचली जातियों के लोगों से घिरे हुए होते हैं, बराबरी के पद पर, और उनका हित भी उन्हीं के साथ नत्थी होता है। तब वे अपनी ही जाति के लड़के या लड़की की खोज में पसीना बहाते रहते हैं।
मेरे लिए तो यह हद दर्जे का पाखंड है। मगर यह रोज़ ही देखने को मिलता है, किसी भी कार्यालय में या कंपनी में यह बहुत सामान्य बात है।
नीचे आप एक डॉक्यूमेंटरी देख सकते हैं जिसमें दिखाया गया है कि कैसे जातिगत भेदभाव भारत में आज भी जारी है।
Related posts
भारत की पाठशालाओं में जातिगत भेदभाव – हमारी समानता! – 17 जुलाई 2012
3 समूह जो जाति-प्रथा को बनाए रखना चाहते हैं और उनके कारण – 20 जून 2012
पाँच सुझाव जिन पर अमल से भारत को इस अमानवीय जाति प्रथा से मुक्त किया जा सकता है – 19 जून 2012
ऑनर किलिंग का कानूनी संस्करण – अपने बच्चों को बहिष्कृत करना – 22 नवंबर 2011
जाति, धर्म, संस्कृति और समाज के नाम पर ‘ऑनर किलिंग’ – 21 नवंबर 2011
जाति के कारण सम्मान हत्या – प्रेम पर अंकुश लगाने का प्रयास – 18 नवंबर 2011
हिन्दू धर्म में नीची जातियों का सम्मान नहीं है – 03 अक्टूबर 2011
हिन्दू होने का दिखावा करते हुए पश्चिमी लोगों का जाति प्रथा का समर्थन – 20 सितंबर 2011
