राष्ट्रमंडल खेल और जाटों के जातीय आरक्षण के बीच क्या संबंध है? – 24 सितंबर 2010

जाति व्यवस्था

कल मैंने आपको राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में बताया था जो दिल्ली में अक्टूबर में होने वाले हैं। मैंने कहा था कि इन खेलों के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं क्योंकि लोगों को लगता है की स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने साल बाद इन खेलों में हिस्सा लेने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है। कुछ और भी लोग इन खेलों के विरोध में प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं मगर उनके आंदोलन का कारण दूसरा है। ये प्रदर्शनकारी जाट जाति के लोग हैं और काफी अरसे से धमकियाँ दे रहे हैं कि वे इन खेलों को सफल नहीं होने देंगे।

वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? उन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहिए! मैं निचली जातियों को सरकारी नौकरियों में मिल रहे आरक्षण के विषय में पहले लिख चुका हूँ जिसमें मैंने बताया है कि कुल नौकरियों का और विश्वविद्यालयों में भरती के लिए उपलब्ध कुल सीटों का कुछ प्रतिशत निचली जातियों के लिए आरक्षित होता है। जाट जाति की कभी भी निचली जाति के रूप में मान्यता नहीं रही है और उन्हें आरक्षण नहीं मिलता। अब जाट आंदोलनकारी चाहते हैं कि सरकार उन्हें नीची जाति के रूप में मान्यता दे जिससे वे भी निचली जातियों को मिलने वाले लाभ प्राप्त कर सकें।

उनकी धमकी स्पष्ट है: अगर आप हमें निचली जाति में शामिल नहीं करते तो हम राष्ट्रमंडल खेलों को होने नहीं देंगे। वे कहते हैं कि वे दिल्ली जाने वाली और वहाँ से निकलने वाली ट्रेनों और बसों का रास्ता रोकेंगे, हड़ताल और नाकेबंदी के ज़रिये बाहर से दूध और सब्जियों को दिल्ली आने नहीं देंगे और इस तरह दिल्ली वालों की मुश्किलें इतनी बढ़ा देंगे कि सरकार उनकी मांगें मानने के लिए मजबूर हो जाएगी।

यह अलग बात है कि अपनी धमकियों पर अमल करने में वे कितना सफल होते हैं लेकिन यह सच्चाई कि सरकार को ऐसी धमकियों का बार-बार सामना करना पड़ता है यही बात सिद्ध करती है कि ये आरक्षण की राजनीति अंततः देश के लिए एक के बाद एक नई समस्याएं खड़ी करती जा रही है। फिर, जाति के आधार पर आरक्षण का क्या औचित्य है? अगर आपने नौकरियों और विश्वविद्यालयों में आरक्षण के लिए हितग्राही की आर्थिक स्थिति को आधार बनाया होता तो यह समस्या कभी पेश नहीं आती। अगर जाटों की मांगें मान ली जाती हैं तो निचली जातियों में एक और जाति शामिल हो जाएगी। साल-दो साल बाद कोई और जाति यही चाहेगी और अपने आपको निचली जातियों में शामिल करवाने के लिए यही रास्ता अख्तियार करेगी। अंत में कौन सी जाति बचेगी जो 'निचली जाति' की परिभाषा के अंतर्गत न आती हो?

यह स्थिति जातियों के बीच घृणा और गुस्सा पैदा करने के अलावा कुछ नहीं करती। मैं वास्तव में यह चाहूँगा कि जो मजबूर हों, गरीब हों और जिन्हें वाकई इस प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो उन्हें आरक्षण प्राप्त हो और जाति आधारित राजनीति खत्म हो। हमें दूसरों के सामने इसका उदाहरण पेश करना चाहिए और लोगों को बताना चाहिए कि आपकी जाति हमारे लिए कोई मानी नहीं रखती। इस धरती पर हम सब इंसान हैं।

इस विषय में एक अखबारी लेख

कल हमने वृंदावन में सैर की और नीचे वृंदावन की विभिन्न जगहों की और यमुना में आई बाढ़ की वीडियो आप देख सकते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि बाढ़ पीड़ितों के लिए आपके बहुमूल्य आर्थिक सहयोग का हम स्वागत करते हैं।

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