भारत की राजनीति, विद्यालय और नौकरियों में जाति व्यवस्था – 25 अक्टूबर 2009

कल मैंने कहा था कि बहुत से लोग आज भी बड़ी अच्छी तरह जानते हैं कि जाति प्रथा क्या है, यहाँ तककि बड़े शहरों में भी। यह समाज में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है यह बात तो है ही, मगर एक और कारण इसके पीछे है। राज्य, सरकार और राजनेता आज भी लोगों को जब-तब इसकी जानकारी और शिक्षा देते रहते हैं।

चुनाव के समय राजनैतिक पार्टियां हर चुनाव क्षेत्र में बाकायदा सारी जातियों की संख्या का अनुमान लगाती हैं और फिर उसी जाति के उम्मीदवार को खड़ा करती है जो वहाँ बहुसंख्या में निवास करते हैं। और फिर उस उम्मीदवार का प्रचार भी इसी आधार पर किया जाता है, यह कहते हुए कि वह उनके बीच का उम्मीदवार है। यह प्रीतिकर लगता है; निचली जाति का उम्मीदवार तो मैदान में है मगर जाति व्यवस्था को वोट प्राप्त करने का जरिया बनाते हुए दरअसल राजनीतिज्ञ स्वयं अपना चुनाव कर रहे होते हैं।

एक दूसरा उदाहरण लें। सरकार को कर्मचारियों की ज़रूरत है, माना विद्यालयों में। अब नियम यह है कि एक विशेष प्रतिशत लोग निचली जातियों से लिए जाने हैं। यह कई समस्याएं पैदा करता है। बहुत वाद-विवाद होते हैं, प्रतिवाद, प्रदर्शन होते हैं क्योंकि निचली जाति के कम योग्य व्यक्ति को नौकरी पर लिया जाता है जबकि कई अधिक योग्य, उच्च जाति के व्यक्ति बेरोजगार रह जाते हैं।

यह आपको समझना होगा कि यह सिर्फ पैसे का मामला नहीं है। किसी भी जाति का व्यक्ति गरीब या अमीर हो सकता है। फिर ऐसा भी कानून है कि ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोगों को उनके जाति आधारित नाम से नहीं बुला सकते अन्यथा उन्हें दंडित किया जा सकता है। यह सुनने में अच्छा लगता है मगर यह कई समस्याएं पैदा कर देता है। लोग यूं ही पुलिस थाने चले जाते हैं और दावा कर देते हैं कि फलाने ने उसे उसकी जाति के नाम से पुकारा और पुलिस जैसी भ्रष्ट है, सीधे उस व्यक्ति के पास जाकर बिना किसी कारण के उससे कुछ न कुछ रुपए ऐंठ लेती है। पुलिस यह तक नहीं देखती कि दावा करने वाला व्यक्ति वास्तव में नीची जाति का है भी या नहीं! यही काम ऊंची जाति के लोग भी पैसे के लिए करते हैं, दोनों में कोई फर्क नहीं है।

तो आप देखते हैं कि आधिकारिक रूप से जाति व्यवस्था का कोई महत्व नहीं रह गया है मगर वे इस व्यवस्था का समर्थन कर रहे होते हैं। मैं इसे ऐसे व्यक्त करता हूँ कि मान लो आप आप कोई पौधा अपने आँगन में नहीं रखना चाहते लेकिन अगर आप उसे लगातार सींचते रहेंगे तो वह क्यों नहीं उगेगा? अगर आप कहें कि जाति व्यवस्था अब समाज से लुप्त हो गई है तो फिर क्यों नहीं आप सिर्फ और सिर्फ योग्यता के आधार पर कर्मचारियों का चयन करते? यह बेहूदी व्यवस्था अब भी बनी हुई है लेकिन हम भेदभाव विमुक्त दुनिया और जाति विहीन समाज बनाने के लिए सतत प्रयास करते रहेंगे, जहां सिर्फ प्रेम होगा।

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