भारत की पाठशालाओं में जातिगत भेदभाव – हमारी समानता! – 17 जुलाई 2012

जाति व्यवस्था

कल मैंने हमारी पाठशालाओं में चल रहे जीर्णोद्धार के बारे में ज़िक्र किया था। यह देखकर कितना अच्छा लगता है कि अब सारे बच्चे वहाँ पढ़ रहे हैं, वे भी जो पहले से हमारे यहाँ थे और वे भी जो हमारी पाठशालाओं में नए भर्ती हुए हैं। कुल मिलकर लगभग 150 बच्चे हमारी पाठशालाओं में पढ़ रहे हैं और निचली जाति के बच्चों की संख्या उतनी ही है जितनी ऊंची जाति के बच्चों की।

इस साल, यानि पिछले पाठशाला-सत्र में, हमारे कुछ बच्चों ने पाँचवी कक्षा पास की और हमारे विद्यालय में उनकी पढ़ाई समाप्त हुई। हमने उनके माता-पिता से कहा कि जब तक उनके बच्चे पढ़ना चाहें हम उनकी सहायता करना चाहेंगे। प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद उन्हें बुनियादी बातों का ज्ञान तो हो गया है मगर वे कोई रोजगार पा सकें इसके लिए उन्हें आगे और भी पढ़ाई करनी होगी और इसमें हमें उनकी सहायता करनी चाहिए।

हमने सरकारी स्कूल से, जहां मैंने भी शिक्षा प्राप्त की थी, संपर्क किया और वहाँ पढ़ने की फीस आदि की जानकारी ली। हमें बताया गया कि जो बच्चे निचली जातियों से आते हैं उनसे कोई फीस नहीं ली जाएगी। लेकिन ऊंची जातियों के बच्चों की फीस हमें अदा करनी होगी।

उनका यह जवाब बड़ा अजीब था और दूसरी तरफ वह बहुत सामान्य भी था। मैंने एक बार भारत की आरक्षण व्यवस्था के बारे में लिखा था, कर्मचारियों की कुल रिक्तियों का एक निश्चित प्रतिशत निचली जातियों के कर्मचारियों द्वारा ही भरा जाएगा। महाविद्यालय और विश्वविद्यालय भी एक निश्चित प्रतिशत तक निचली जातियों के बच्चों को प्रवेश देने हेतु बाध्य होंगे। जातिगत आधार पर लोगों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए ये नियम बनाए गए। लेकिन यह नियम भेद और अलगाव पैदा करता है और वास्तविकता यही है कि लोगों के दिमागों में इससे जातिगत भेदभाव और भी दृढ़ हुआ है।

उदाहरण के लिए, हमारे मामले में वास्तव में वह ऊंची जातियों के गरीब बच्चों के साथ भेदभाव करता नज़र आता है। इन बच्चों का इतना ही दोष है कि वे ऊंची जातियों में पैदा हुए। हम जानते हैं कि उनके परिवारों की आमदनी इतनी नहीं है कि वे उन बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च वहन कर सकें। इसके बावजूद उन्हें फीस अदा करनी होगी जबकि निचली जातियों के बच्चे जिनके परिवार हो सकता है आर्थिक रूप से बेहतर हालत में हों, बिना फीस दिये ही पढ़ पाएंगे।

तो इस तरह भेदभाव पिछले दरवाजे से प्रवेश करने में सफल हो गया! वैसे अधिकतर पाठशालाओं में ऊंची जाति कि बच्चों के साथ निचली जाति के बच्चों की अपेक्षा बेहतर व्यवहार किया जाता है। उन्हें अगली पंक्ति में बिठाया जाता है और शिक्षक उन्हें कम डांटते-फटकारते हैं और मारते भी कम हैं। निचली जातियों के बच्चों से पढ़ाई के अतिरिक्त भी कई काम करवाए जाते हैं। कई काम जिन्हें कोई भी करना पसंद नहीं करता, जैसे संडास, बाथरूम की सफाई, उनसे करवाए जाते हैं। भोजन के वक़्त बच्चों को अनिवार्य रूप से अलग-अलग बिठाया जाता है क्योंकि ऊंची जातियों के बच्चे नहीं चाहते कि उनका भोजन निचली जाति के बच्चों के संसर्ग में 'अपवित्र' हो जाए।

नीचे दिये गए वीडियो में, जो जातिभेद पर एक बहुत अच्छी डॉक्यूमेंटरी है, आप बच्चों को ऐसे स्थितियों में घिरा देख सकेंगे। यह वीडियो इस बात का प्रमाण है कि जातिगत भेदभाव आज भी भारत में पाँव पसारे हुए है।

हमने बराबरी की अवधारणा पर अपनी शालाओं की स्थापना की है। हमारे सारे बच्चे बराबर हैं, चाहे वे किसी भी जाति के हों। वे बेंच पर एक साथ बैठते हैं, पढ़ना एक जैसा सीखते हैं और सबसे बड़ी बात, भोजन भी एक साथ ही करते हैं। यही बराबरी की शिक्षा हमारी पाठशालाओं में हमारे बच्चों ने प्राप्त की है। अब सरकारी स्कूलों में जाकर अगली कक्षाओं में वे जानेंगे कि निचली जाति के बच्चों को फीस नहीं देनी पड़ेगी जबकि ऊंची जाति के बच्चों को देनी पड़ेगी।

कोई बात नहीं, हमने निर्णय लिया है कि इन बच्चों को हम गैरसरकारी स्कूलों में दाखिल कराएँगे और हम उनकी फीस और किताब-कापियों का और दूसरी मदों में होने वाला खर्च भी वहन करेंगे, भले ही हमें कुछ अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़े, क्योंकि वहाँ बेहतर पढ़ाई होती है।

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