आर्य समाज और जाति विहीन समाज के बारे में उनकी कल्पना – 23 अक्टूबर 2009

जाति व्यवस्था

कल मैंने कहा था कि मैं आर्य समाज और कुछ बातों में वे किस तरह ज़्यादा आज़ाद खयाल हैं, इस विषय पर कुछ विस्तार से बताऊँगा। मैं उनके सब विचारों का समर्थन नहीं करता, जैसे ब्रह्मचर्य पर उनका विश्वास। लेकिन धर्मग्रंथों पर अपने अटूट विश्वास के बावजूद वे कहते हैं कि महिलाएं स्वामी नहीं बन सकती या अगर बन जाएँ तो किसी तरह कमतर होंगी, ऐसा उनमें कहीं नहीं लिखा है।

और मेरे विचार में उनका सबसे अच्छा विश्वास यह है कि वे जाति व्यवस्था का पूरी तरह खंडन करते हैं। उन्हें पता चला है कि जातियों के बारे में वेदों में कहीं नहीं लिखा है। और इसलिए वे सबको समान मानते हैं। चाहे वह किसी भी जाति का हो, यहाँ तककि जिन्हें अछूत कहा जाता है उनके साथ भी वे बराबरी का व्यवहार करते हैं।

आज भी ऐसे दकियानूसी और कट्टरपंथी लोग मौजूद हैं जो जाति व्यवस्था पर पूरा भरोसा करते हैं और जो निचली जाति के किसी व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकते। मैं अपने विद्यालय के इस मुख्य विचार के बारे में पहले भी लिख चुका हूँ: बिना किसी भेदभाव के सभी साथ रहें, जिससे बच्चे शुरू से यही सीखें कि हम सब समान हैं। और हम आशा करते हैं कि उनके अभिभावकों पर भी इसका अच्छा असर होगा।

आज थॉमस और आइरिस आश्रम से बिदा ले रहे हैं। उनके जाने से हम लोग दुखी हैं क्योंकि हमें उनके साथ रहना अच्छा लगता है और उन्हें हमारे साथ रहना अच्छा लगता है। मैं जानता हूँ कि अधिकांश लोगों से हमारा जीने का तरीका अलग है। लोग मुझे बताते हैं कि वे अपने मित्रों के साथ रहकर प्रसन्न होते हैं मगर जब वे वापस घर जाकर दरवाजे बंद कर लेते हैं तब भी वे खुश ही रहते हैं। लेकिन हमारा विचार कुछ ऐसा है:बिना किसी का अपमान किए भी आप अकेले रह सकते हैं और आप हमेशा सबका साथ पाकर खुश होते हैं। हमारी मित्रता में यह प्रेम का तत्व ही है जिससे हम कहीं भी रहें हम साथ ही होते हैं।

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