पाँच सुझाव जिन पर अमल से भारत को इस अमानवीय जाति प्रथा से मुक्त किया जा सकता है – 19 जून 2012

जाति प्रथा के विषय में बात करते हुए यह कहा जाता है कि यह गँवारों की एक पुरानी प्रथा है, लोगों के बीच दूरी पैदा करने वाली एक असभ्य व्यवस्था, जो कुछ लोगों को नीच घोषित करके प्रताड़ित करती है। आप यह प्रश्न भी सुनते हैं कि इसे समाप्त कैसे किया जाए। सोचें, जाति प्रथा को समाप्त करने का क्या उपाय किया जाए?

मैंने अपने एक पुराने ब्लॉग में लिखा था कि असल में राजनीतिज्ञ जाति प्रथा का लाभ उठाते हैं। इसलिए सरकार और राजनीतिज्ञों को इसे समाप्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे यह जानते हैं कि उनकी जाति वाले किसी दूसरी जाति वाले को नहीं, उन्हें वोट देंगे और इस तरह वे वोट प्राप्त करने में इसका उपयोग करते हैं। और यह ऊंची और निचली जाति, दोनों में समान रूप से होता है। यही कारण है कि वे जाति प्रथा को सुचारू रूप से चलने देना चाहते हैं। ज़ाहिर है, अगर इस गंदी प्रथा को समाप्त करना है तो सबसे पहले राजनीतिज्ञों और सरकारों को अपना रवैया बदलना होगा। उन्हें जाति प्रथा को समर्थन देने के बजाए उसके विरुद्ध मुहीम छेड़नी होगी। इसे कैसे किया जाए इस बारे में मेरे पास कुछ सुझाव हैं।

1) जाति आधारित संगठनों के विरुद्ध कानून

सबसे पहले जाति आधारित संगठन बनाने पर ही कानूनी रोक लगनी चाहिए। जी हाँ, हर छोटे-बड़े कस्बों में और हर जगह ऐसे कई संगठन हैं। उन्हें किसी विशेष जाति के नाम पर पंजीकृत किया जाता है और सिर्फ उन्हीं जातियों के लोग उस संगठन के सदस्य बन सकते हैं। उनके लक्ष्य भिन्न हो सकते हैं मगर एक बात सबमें समान होती है: वे सभी अपनी जाति के लोगों के हित में ही कार्य करते हैं। ऐसे संगठनों पर तुरंत पाबंदी लगाई जानी चाहिए। पंजीकृत हों या न हों, उन्हें जाति के आधार पर कोई संगठन या संस्था बनाने की इजाज़त ही नहीं होनी चाहिए।

2)विवाहों के विज्ञापनों में जाति का उल्लेख बंद होना चाहिए

दूसरी बात जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए वह है अखबारों में दिये जाने वाले शादी के विज्ञापनों का वर्तमान में प्रचलित तरीका। मैंने एक बार डायरी में लिखा था कि कैसे विज्ञापनों को जातिगत आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। लोग सीधे उन विज्ञापनों की ओर लपकते हैं जिसके शीर्ष पर 'ब्राह्मण लड़की के लिए' छपा होता है। सरकार के पास ऐसे कानून बनाने के पूरे अधिकार हैं जो इस बेहूदे ढांचे को बदल सकते हैं। लोग अपने बच्चों के लिए ऐसे साथी की तलाश तो कर सकते हैं जिनमें कुछ विशेष गुण हों मगर वह जाति निरपेक्ष गुण ही हो सकते है।

3)अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन

मेरी कार्य योजना का यह सुझाव पिछले सुझाव के साथ ही जुड़ा हुआ सुझाव है। राज्यों को अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करना चाहिए। अगर आप यह कहते हुए प्रतिवाद करें कि यह तो एक व्यक्तिगत मामला है और सरकारें इस मामले में कुछ नहीं कर सकतीं तो मैं कहना चाहूँगा कि आपकी बात पूरी तरह सही नहीं है। सरकार तो बच्चे कम पैदा करने के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है। सरकार इसका प्रचार करती है, नसबंदी कराने या वंध्याकारण कराने पर उन्हें पैसा दिया जाता है। तो फिर इस बारे में क्या दिक्कत है कि लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे अपने लिए किसी दूसरी जाति वाला जीवन साथी ढूँढ़ें। प्रोत्साहित करने के कई तरीके हो सकते है जैसे सीधे कुछ रकम उन्हें दे दी जाए या वे चाहें तो उन्हें घर बनाने के लिए ऋण मुहैया कराया जाए।

4) मंदिरों में निचली जातियों के लोगों को पुजारी मुकर्रर करना

एक और बात जो निचली जातियों के प्रति भेदभाव के बारे में बातचीत के दौरान मैं हमेशा से कहता आया हूँ: उन लोगों पर आज भी कई मंदिरों में प्रवेश की मनाही है जबकि बाकी दूसरी जातियों के लोग प्रवेश कर सकते हैं। सरकार का मंदिरों पर पूरा नियंत्रण होता है और उसे अधिकार है कि वह मंदिरों में निचली जातियों के लोगों को पुजारी नियुक्त कर सके। मैं वह दृश्य देखना चाहूँगा कि एक (तथाकथित) अछूत व्यक्ति एक ब्राह्मण को प्रसाद, भगवान को अर्पित पवित्र चढ़ावा, बाँट रहा है। क्यों नहीं? निचली जाति के लोग मंदिरों में प्रवेश क्यों न करें?

5) अपने अंतिम नाम (लास्ट नेम या सरनेम) को बदलना

इस वक़्त किसी व्यक्ति की जाति उसके कुल-नाम से, जिसे अंग्रेज़ी में लास्ट नेम या सरनेम कहते हैं, जानी जा सकती है। हालांकि इसमें धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है, मेरा विश्वास है कि यह अच्छा होगा कि सरकार सिर्फ एक बार सभी नागरिकों को अपना अंतिम नाम (लास्ट नेम या सरनेम) बदलकर कोई और मनपसंद नाम चुनने की आज़ादी दे दे। उसके बाद कोई यह नहीं बता पाएगा कि वे ऊंची या नीची जाति के हैं।

मुझे एहसास है कि सिर्फ इतना ही काफी नहीं है। मुख्य समस्या और मुख्य काम तो लोगों की मानसिकता बदलना है। लोगों को अपने सोच में बड़ा परिवर्तन लाना होगा। जाति प्रथा पर विश्वास करने वाले बहुत से लोग मेरी टिप्पणियों से सहमत नहीं होंगे और कहेंगे कि ये सुझाव व्यावहारिक नहीं हैं। लेकिन जहां परिवर्तन की अभिलाषा और उसे कार्यरूप में परिणत करने का माद्दा है वहाँ कुछ भी असंभव नहीं है और परिवर्तन निश्चय ही कारगर होगा। मैं इस विषय में आपके विचार जानना चाहूँगा।

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