कल मैंने 5 विचार पेश किए थे जो जाति प्रथा को समाप्त करने में कारगर हो सकते हैं। अगर विचारों से ही कुछ हो पाता तो मुझे विश्वास है अब तक हमारे समाज से जाति प्रथा कब की मिट चुकी होती। अगर वास्तव में सभी चाहते हैं कि यह प्रथा समाप्त हो जाए तो फिर निस्संदेह उसे आज ही समाप्त हो जाना चाहिए! मगर ऐसा नहीं है। आज मैं उन तीन समूहों के बारे में लिखूँगा जो नहीं चाहते कि जाति प्रथा कभी भी समाप्त हो।
1) राजनीतिज्ञ – क्योंकि वह उनके लिए उपयोगी है
मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि राजनीतिज्ञ और सरकारें कभी भी मेरे विचारों को अमल में लाना नहीं चाहेंगी। क्योंकि ऐसा करने से कई राजनीतिज्ञों का वह आधार ही नष्ट हो जाएगा जिस पर पैर जमाकर वे लोकसभाओं और विधानसभाओं की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। अपने इलाकों में वे इसलिए नहीं जीतते कि उनकी विचारधारा या देश के लिए उनकी योजनाएं लोगों को रास आती है बल्कि इसलिए कि वे उसी जाति के हैं जिसका उस इलाके में बहुमत है। राजनीतिज्ञ जानते हैं कि लोग और विशेषकर अनपढ़ जनता इसी आधार पर वोट देती हैं, और वे उनके वोट खोना नहीं चाहते। अगर वे जाति को ध्यान में रखकर चुनाव न लड़ें तो जीतने के लिए उन्हें अधिक मेहनत करना होगी, लोगों की भलाई के लिए कुछ करके दिखाना होगा। तो, भले ही राजनीतिज्ञ स्वयं न मानते हों कि जाति प्रथा ईश्वर की मर्ज़ी से कायम है, मगर वे अपने मतलब के लिए उसका दोहन करने से नहीं चूकते।
2) ऊंची जातियाँ – क्योंकि वे ईमानदारी से जाति प्रथा पर विश्वास करते हैं या वे उससे प्राप्त सुविधाओं को खोना नहीं चाहते
जाति प्रथा की समाप्ति न चाहने वाला जो दूसरा समूह है वह बिल्कुल सुस्पष्ट है: ऊंची जातियों में शामिल लोग जो जाति प्रथा में अटूट विश्वास करते हैं। स्वाभाविक ही ये ब्राह्मण हैं, इस प्रथा की संरचना में सबसे ऊपर बैठे लोग। मगर वे अकेले नहीं हैं; दूसरे ऊंची जातियों वाले भी हैं। इसे आजकल की भाषा में 'ब्राह्मणवादी मानसिकता' कहा जाता है क्योंकि आज कई ब्राह्मण हैं जो जाति प्रथा में विश्वास नहीं करते और कई दूसरी जातियों वाले हैं जो इसे पूरी तरह बरकरार रखना चाहते हैं।
यह बड़ी अजीब बात है कि आज भी ऐसे लोग हैं जो वास्तव में समझते हैं कि जाति प्रथा एक जायज़ व्यवस्था है, कि उसे बना रहना चाहिए और यह भी कि दरअसल वह कभी समाप्त न होने वाली अटल व्यवस्था है। कुछ लोग दूसरों के लिए अछूत बने रहें, यह हरि-इच्छा है, ईश्वरीय आदेश है। वे पूरी गंभीरता के साथ ऐसा विश्वास करते हैं।
हो सकता है कि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले दूसरे लोग इस बात पर पूरा विश्वास न करते हों। वे यह नहीं मानते कि ईश्वर ऐसा चाहता है मगर वे इस व्यवस्था में मिली अपनी हैसियत को बरकरार रखना चाहते हैं। इसमें उनका लाभ है और वे उसे लागू रखना चाहते हैं। वे जाति प्रथा में ईमानदारी से विश्वास रखने वाले लोग नहीं हैं, सिर्फ अपने मतलब और लाभ के लिए इस बुरी व्यवस्था से चिपके हुए हैं।
3) निचली जातियाँ – जाति अभिमान और प्रताड़ित मनोभावना वश
फिर वह वर्ग है जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते कि वह भी जाति प्रथा का समर्थक हो सकता है। वे हैं निचली जातियों और सबसे नीची जाति में शामिल लोग। जी हाँ, निचली जातियों में भी ऐसे लोग पाए जाते हैं जिनकी कोई रुचि नहीं होती कि जाति प्रथा समाप्त की जानी चाहिए।
इसे समझने के लिए आपको इस बात पर गौर करना होगा कि हर जाति अपने समूह पर एक तरह का गर्व महसूस करती है। यहाँ तक कि नीचतम जातियों ने, अछूतों ने भी अपने मन में अपनी जाति के लिए एक तरह के स्वाभिमान की भावना विकसित कर ली है। यह मानवीय मनोवृत्ति है। वे एक जाति में अपने आपको शामिल करके सुरक्षित महसूस करते हैं, वह उनकी पहचान बन जाती है और वे अपने लोगों के साथ, अपने समाज के साथ एकात्म होकर गर्व का अनुभव करते हैं। जाति प्रथा की समाप्ति उनके लिए अपने अस्तित्व के एक हिस्से को खोने जैसा होगा। यह एक तरह की भ्रांति, मरीचिका है मगर उनके लिए यही यथार्थ भी है।
निचली जातियों के जाति प्रथा की समाप्ति का विरोधी होने का दूसरा और शायद सबसे बड़ा कारण यह है कि वे पीड़ित महसूस करने में आनंद का अनुभव करने लगे हैं। मैंने पहले भी ऐसे लोगों के बारे में लिखा है जिनके लिए पीड़ा ही आनंद का कारण बन जाती है और बहुत से निचली जातियों के लोग इसी श्रेणी में आते हैं। वे न्याय न मिलने की शिकायत करेंगे, अपना दुखड़ा रोते रहेंगे, अधिक पाने की याचना करेंगे लेकिन अंततः अपनी हालत को बदलने में कोई रुचि नहीं लेंगे। कैसी विडंबना है कि ऐसी हालत में भी वे भेदभाव बर्दाश्त करने के लिए तैयार होते हैं मगर इतना साहस नहीं जुटा पाते कि इस दुरावस्था से बाहर निकलने की कोशिश करें।
तो आपने देखा कि एक तरफ पता नहीं कितने कर्मठ सुधारक, मेरे जैसे कितने लोग हैं, जो जाति प्रथा से इतनी घृणा करते हैं और उसे हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अनगिनत ऐसे लोग भी हैं जो सोचना भी नहीं चाहते कि ऐसा किया जा सकता है। जब तक ऐसी हालत है, जब तक राजनीतिज्ञ और ब्राह्मण सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, जब तक लोग मूर्खतावश या अज्ञान के चलते यह विश्वास करते हैं कि ऐसा ही चलता रहेगा और यही ईश्वर की मर्ज़ी है और जब तक निचली जातियों के लोग प्रताड़ित होना नहीं छोड़ते तब तक जाति प्रथा बरकरार रहेगी। परिवर्तन समाज के भीतर से आएगा। मैं उसके लिए बिल्कुल तैयार हूँ, क्या आप भी हैं?
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