पिछले हफ्ते मैंने उन लोगों के बारे में लिखा था जो दूसरों को अपने धर्म में शामिल करना चाहते हैं। मैंने समझाया था की कैसे ऐसी कोशिश करना भी अच्छा विचार नहीं है। मैंने यह भी कहा था कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग धर्म त्याग रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी विश्वास की तरफ जबर्दस्ती मोड़ने की कोशिश हो रही है। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो पूर्णतः चाहते हैं कि कोई दूसरा धर्म अपना लें और कुछ धर्म हैं जो खुशी-खुशी उन्हें अपनाने के लिए तैयार बैठे हैं।
भारत में बहुत से लोग जिन्हें हिन्दू धर्म में दूसरों से नीचा माना जाता है, बहुतायत से ऐसा कर रहे हैं। दलित, निचली जाति के लोग हजारों की संख्या में खुशी-खुशी अपना धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। मैंने एक बौद्ध आयोजन के बारे में एक लेख में पढ़ा जिसमें हजारों हिन्दू, जिनमें अधिकतर निचली जातियों के लोग थे, धर्म परिवर्तन करके बौद्ध हो गए। दरअसल, ऐसे आयोजनों के बारे में हम अक्सर सुनते रहते हैं।
मेरी नज़र में इसका कारण स्पष्ट है: हिन्दू उन्हें दूसरी कोटि का मनुष्य समझते हैं, घृणित समझते हैं और उनसे छोटे से छोटा और गंदे से गंदा काम कराते हैं। ऊंची जातियों के लोग उनके साथ खाना खाना पसंद नहीं करते क्योंकि वे उन्हें अछूत समझते हैं और कोशिश करते हैं कि किसी तरह उनसे दूर रहा जाए। उनका कोई सम्मान नहीं होता और उन पर उनके अपने धर्म के भीतर ही कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं। और यह सब सिर्फ इसलिए होता है कि वे एक नीची जाति में पैदा हुए। मैं उनके गुस्से को समझ सकता हूँ।
हिन्दू धर्म अकसर इस सच्चाई पर गर्व करता है कि आप पैदाइशी हिन्दू होते हैं और इसलिए आम तौर पर हिन्दू दूसरों को अपने धर्म में शामिल करने की कोशिश नहीं करते। मैंने इसका पहले भी ज़िक्र किया है कि यह एक अच्छी बात है। लेकिन कल्पना कीजिये कि आप पैदाइशी हिन्दू हैं मगर एक निचली जाति के हिन्दू। क्या आप ऐसा हिन्दू होकर खुश होंगे? क्या आपको ऐसे धर्म का सदस्य होने पर गर्व का अनुभव होगा? या कोई बौद्ध भिक्षु आकर आपके सामने, सारे अधिकार और आदर सहित, बौद्ध धर्म में शामिल होने का प्रस्ताव रखता है, तब आप खुश होंगे?
मुझे विश्वास है कि हर कोई इस बात से सहमत होगा कि बौद्ध धर्म यहाँ बेहतर विकल्प पेश करता है। हिन्दू धर्म वाकई इतना नीचे गिर गया है! जाति प्रथा अमानवीय है और आज की दुनिया में अनुपयुक्त भी है। लोग खुद अपने ही धर्म द्वारा अपना ही दमन बर्दाश्त नहीं कर सकते, खासकर तब, जब वे एक स्वतंत्र, प्रजातान्त्रिक राष्ट्र के निवासी होते हैं, जहां उन्हें बताया जाता है कि उनके पास अपनी बात कहने की, स्वतंत्र विचार रखने की और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने की पूरी आज़ादी है। इसलिए अगर उनके पास विकल्प है तो वे क्यों एक दमन करने वाले धर्म में दूसरे दर्जे के मनुष्य के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रखकर संतुष्ट रहें?
ये ‘निचली जाति के लोग’ दरअसल बाबासाहेब अंबेडकर का अनुकरण कर रहे हैं जो भारत के इतिहास में एक महामानव और बहुत ही महत्वपूर्ण नेता थे। वे एक अछूत जाति में पैदा हुए थे और विश्वविद्यालय की उपाधि अर्जित करने वाले पहले निचली जाति के व्यक्ति थे। और आज वे भारतीय संविधान के जनक माने जाते हैं। अंबेडकर ने ठीक यही किया था: वे बौद्ध हो गए और जीवन भर निचली जातियों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ अनवरत संघर्ष करते रहे। उन्होंने अपने अनुभव से जाना कि निचली जाति में जन्म लेने का अर्थ क्या होता है और अपने जीवन काल में ही उन्होंने निचली जातियों के हजारों लोगों का धर्म परिवर्तन करवाया और उन्हें बौद्ध धर्म में दीक्षित किया।
धर्म द्वारा दमन की यही तार्किक परिणति हो सकती है।
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