भारतीय नाभियाँ या पश्चिमी पिंडलियाँ – क्या ज़्यादा सेक्सी है? 22 दिसंबर 2014

कुछ समय पहले एक महिला ने मेरे ब्लॉग पर एक टिप्पणी की थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि भारतीय समझते हैं कि पश्चिम के लोग नग्न शरीर को लेकर अधिक सहिष्णु होते हैं। उसने इस बात पर उंगली रखकर पुनः एक बार मुझे यह समझने पर मजबूर किया कि वास्तव में यह सांस्कृतिक मामला है-और आप एकबारगी यह अंतिम फैसला नहीं सुना सकते कि पश्चिम के लोग तो नग्नता को सहजता से लेते हैं लेकिन भारतीय नहीं ले पाते! इस विषय पर थोड़ा विस्तार के साथ चर्चा करना उचित होगा!

यह तो स्पष्ट ही है कि जहाँ पश्चिमी देशों में बीचों पर नग्न विचरण करने के लिए बाकायदा अलग से इलाके नियत हैं, यहाँ, भारत में आप बिकनी उतारकर घूम सकें, इस बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। लेकिन ‘पश्चिम’ शब्द बहुत बड़े इलाके का द्योतक है। मुझे मालूम है कि कुछ समय पहले तक जहाँ जर्मन और फ्रांसीसी पर्यटक कमर से ऊपर नग्न होकर धूप-स्नान किया करते थे, ब्रिटिश लोगों को ऐसा करने में असुविधा होती थी और वे दूसरे देशों के पर्यटकों को कुछ ज़्यादा ही उन्मुक्त या स्वच्छंद मानते थे।

सन् 2010 के अपने अमरीकी दौरे में हम बीच पर गए और मैं एक वस्त्र पहने हुए था, जिसे मैं अक्सर बीचों पर पहना करता था- और उसे हमारे यहाँ लँगोटी कहा जाता है। हमारी आयोजक, एक महिला, जो हमारे साथ आई थी, घबरा गई और कहा कि पुलिस आकर एतराज़ कर सकती है! और देखिए, कि मैं कतई नग्न नहीं था!

कहने का अर्थ यह कि वस्त्र धारण करने के मामले में अलग-अलग देशों में अलग-अलग नियम और परंपराएँ हैं। जहाँ तक भारत का सवाल है, वे बड़े ढँके-छिपे रहना पसन्द करते हैं, बल्कि कहना चाहिए-पाखण्डी हैं, समुद्र में भी नहाते वक़्त पूरे कपड़े पहने रहते हैं। लेकिन, फिर भी यह पूरी तरह सच नहीं है!

भारत में बहुत से हिन्दू और जैन साधू देश भर में पूरी तरह नग्न घूमते रहते हैं! बाज़ारों, मुहल्लों में, आदमी, औरतों और बच्चों के सामने-और कोई एतराज़ नहीं करता। यहाँ तककि उनके बहुत से शिष्य होते हैं-अच्छी खासी भीड़, जो कुछ फुट की दूरी पर बैठे अपने गुरु के शिश्न का नज़ारा करते हैं और न तो उन्हें कोई शर्म आती है और न उनके शिष्यों को, जिनमें बहुत सी महिलाएँ भी होती हैं। वे अपने नग्न गुरु के पैर पखारते हैं। आप किसी भी पश्चिमी शहर में मादरज़ाद नंगे घूमकर देखिए, पुलिस आकर आपको तुरंत अंदर कर देगी! फिर आप समझाते रहिए कि आप संत हैं और उपासना का आपका यही तरीका है, आपको कोई छूट नहीं मिलने वाली!

महिला वस्त्रों को लेकर भी यही बात है-जब लोग दूसरी संस्कृतियों की, खासकर पश्चिमी संस्कृतियों की, अशालीनता या अभद्रता की बात करते हैं तब अक्सर बड़ी समस्या पेश आती है। लेकिन हमारे आश्रम में आने वाले विदेशी मेहमान इसका ठीक उल्टा सोचते हैं! वे जानते हैं कि भारत में पिंडलियों का प्रदर्शन यौनोत्तेजक माना जाता है और उन्होंने पढ़ रखा होता है कि इसी कारण भारतीय महिलाएँ हमेशा टखने तक की साड़ियाँ, घाघरे या पैंट पहनती हैं! लेकिन उनके लिए पिंडलियों का दिखाई देना उतना उत्तेजक नहीं होता, जितना पूरी पीठ और पेट का खुला होना, जैसा कि साड़ियों में या चोली-घाघरे में भारतीय महिलाओं का होता है!

जी हाँ, अधिकांश पश्चिमी लोगों को साड़ी बहुत सेक्सी वस्त्र लगता है क्योंकि उसमें महिलाओं की पूरी पीठ और पूरा पेट साफ़ दिखाई देते हैं! जर्मन महिलाओं के लिए पेट उनके शरीर का वह हिस्सा है, जिसे वे सिर्फ बीचों पर ही खुला छोड़ती हैं क्योंकि बीचों पर वे बिकनी पहनती हैं-बल्कि वहाँ भी वे अक्सर नहाने के वस्त्र पहनकर पेट को ढँके रखना उचित समझती हैं! लेकिन वे स्कर्ट पहनकर मज़े में दफ्तर जा सकती हैं, भारतीय महिलाएँ जिसे पहनने की कल्पना भी नहीं कर सकतीं।

चर्चा का निष्कर्ष स्पष्ट है: बिना उनके देशों की परिस्थितियों को भली प्रकार से जाने-समझे किसी के बारे में कोई गलत धारणा न बनाएँ, यह भी सोचें कि दूसरे भी किसी न किसी कारण से आपके बारे में वैसा ही सोच सकते हैं!