क्या आप अपने शरीर से नाखुश हैं, मनपसंद खाना खाने के बाद क्या आप पछताते या ग्लानि महसूस करते हैं? 23 फरवरी 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जो सबके, यानी पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है: आपको अपने शरीर में अच्छा महसूस करना चाहिए। वह स्वस्थ होना चाहिए और उसकी देखभाल करना आपके लिए ज़रूरी है। लेकिन साथ ही आपको सुंदरता संबंधी किसी स्थापित आदर्श के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है और न ही ‘आदर्श वज़न’ की जानकारी देने वाले आंकड़ों को पाने की कोशिश करनी चाहिए। आपको ‘दुखी या नाखुश’ करने के प्रयास में उन्हें सफल मत होने दीजिए!

सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहता हूँ कि वास्तव में मैं स्वस्थ भोजन और स्वस्थ वज़न का पक्षधर हूँ। जब मैं कहता हूँ कि आपको अपने शरीर से प्रेम करना चाहिए तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपने अतिरिक्त वज़न की अनदेखी करें, जो आपके शरीर में पीठ, कूल्हों और घुटनों की समस्याएँ और मधुमेह जैसी खतरनाक बीमारियाँ स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ़ें पैदा कर रहा है। जब मैं कहता हूँ कि आप अपने शरीर में अच्छा महसूस करें तब आपको अस्वास्थ्यकर अतिरिक्त वज़न लेकर चलने के लिए प्रेरित नहीं कर रहा होता। वास्तव में वह तो बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

लेकिन मोटापे और दुबलेपन के बीच बहुत बड़ा विस्तार है। और यही वह बात है, जिसे अक्सर बहुसंख्य लोग स्वीकार नहीं करते। सुंदरियाँ, जिनका प्रचार अधिकांश मिडिया कर रहा होता है, हमेशा एक ही चीज़ दिखाते हैं: एक जैसी शरीर-यष्टि, एक जैसा वज़न, एक विशेष तरीका, जैसा आपको होना चाहिए। यह बेहद अस्वाभाविक या अप्राकृतिक है बल्कि यह असंभव है कि धरती पर रहने वाले सभी लोग उसे प्राप्त कर सकें और उनके जैसे दिखाई दें।

और इन आदर्शों की नकल करके इतने कम अंतराल में आप अपने शरीर को किस तरह बदल पाएँगे? दस साल से शरीर में मौजूद मांसल गोलाइयों को मिटाकर अगले दशक में आप शरीर को छरहरा किस तरह बना लेंगे? आपको एक ही शरीर प्राप्त हुआ है और आप उसमें में दोनों चीजें एक साथ नहीं पा सकते!

इसलिए मैं कहता हूँ कि अच्छा महसूस करना अत्यंत आवश्यक है! उस आदर्श वज़न सीमा से आपका वज़न ज़्यादा हो या कम, जब तक आप स्वस्थ हैं, आपको अच्छा महसूस करते रहना चाहिए! और इसमें भोजन, खाना-पीना और व्यायाम, सभी सम्मिलित हैं!

वास्तव में मैं तो अच्छे खाने का बहुत शौकीन हूँ और अपना दैनिक योगाभ्यास और व्यायाम भी मुझे बहुत प्रिय है। लेकिन मैंने बहुत सी औरतों से सुना है कि भोजन करते वक़्त वे अपनी एक-एक कैलोरी गिनती हैं और हर त्योहारी खाने के बाद या यूँ ही अपना मनपसंद खाना खाने के बाद अपराधी सा महसूस करती हैं-जब कि वास्तव में अपना मनपसंद खाना खुशी-खुशी ग्रहण करना चाहिए! नतीजा यह होता है कि भोजन करने का समय उनके लिए बड़ा त्रासदायक समय होता है और वह कई तरह के विकारों का कारण भी बन सकता है!

पुरुष भी इन समस्याओं से घिरे पाए जाते हैं, अंतर सिर्फ इतना होता है कि सुडौल मांसपेशियाँ बनाने के चक्कर में और भोजन के साथ ली गई अतिरिक्त कैलोरियों को पसीने के साथ बहाने के लिए उन्हें खेलकूद और व्यायाम की धुन लग जाती है। अच्छे, पसीना बहाने वाले, श्रमसाध्य व्यायामों से कोई गिला नहीं, लेकिन अगर आपको रोज़ जिम जाना पड़ता हो और हर त्योहारी खाने के बाद कैलोरी जलाने के लिए घंटों दंड-बैठक लगाना (वर्क-आउट करना) पड़ता हो, तो फिर यह एक असहज बाध्यता बन जाती है। यह व्यवहार अपने शरीर के प्रति प्रेम प्रकट नहीं करता।

खाने को लेकर कोई अपराधबोध या ग्लानि महसूस न करें, उसका आनंद लें। व्यायाम भी मज़ा लेते हुए करें, मजबूरी में नहीं। और अगर किसी दिन नहीं कर पाते या किसी दिन कम व्यायाम कर पाते हैं तो अफसोस न करें। किसी भी आदर्श के लिए बाहरी दबाव महसूस न करें- और अपने शरीर से प्रेम करें। जीवन का आनंद लें-अगर आप उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देंगे तो यह संभव नहीं हो सकता!