आज मेरा 42वां जन्मदिन है। 41 जन्मदिन मना चुकने के बाद मुझे अब यह तथ्य आश्चर्यजनक नहीं लगता कि मेरे जीवन का एक साल और बीत गया। इसके बावजूद अपने पिछले जन्मदिनों से यह जन्मदिन कुछ अलग है।
जन्मदिन क्या है? क्या यह सिर्फ अपना उत्सव मनाने का दिन है? आप इस खुशी में पार्टी करना चाहते हैं कि आज के दिन आप इस धरती पर अवतरित हुए? इस संयोग पर लोग आपको बधाई दें? दरअसल इस दिन को मैं इस तथ्य से बढ़ कर मानता हूँ कि आप पैदा हुए, दरअसल यह वह दिन है, जिस दिन आपकी माँ ने आपको जन्म दिया! दरअसल यह सिर्फ आपका विशिष्ट दिन नहीं है बल्कि आपके साथ आपकी माँ का भी है!
एक पिता के रूप में अब मैं जानता हूँ कि अपनी बेटी के जन्म दिवस का मैं किस बेसब्री के साथ इंतज़ार कर रहा हूँ। वह दिन अभी तीन माह दूर है, जब वह दो साल की हो जाएगी। लेकिन मैं अभी से उस दिन क्या-क्या करना है, इसकी योजना बना रहा हूँ और बेटी के आनंद की कल्पना करते हुए पुलकित होता रहता हूँ। जब भी मैं और अपरा की माँ इस विषय में बात करते हैं, बातों का रुख उस दिन की तरफ मुड़ जाता है, जिस दिन अपरा इस संसार में आई थी। नहीं, सिर्फ वह दिन नहीं बल्कि उसके पहले और बाद के कई-कई दिन।
चालीस साल बाद शायद एक माँ के मन में उतने पुराने जन्मदिन की उतनी उत्कंठा नहीं होती होगी। लेकिन मुझे विश्वास है कि उसके जन्मदिन पर उस प्रभात, दोपहर, शाम या रात की याद आती होगी, जब उस बेटे या बेटी ने, तब एक छोटी-सी जान, इस संसार का उजाला देखा होगा। कैसे उसने उस हल्के-फुल्के बच्चे को वात्सल्य और उमड़ते प्रेम के गहरे एहसास के साथ बाहों में भर लिया होगा।
अपनी माँ के बगैर मेरा यह पहला जन्मदिन है। पिछले साल मेरा जन्मदिन, अपने विवाह की सालगिरह और दीवाली मनाने के बाद अचानक वह हमें छोड़कर चली गई। वह एक अप्रत्याशित सदमा था कि वह इतनी कम उम्र में हम सबको दुख और हैरानी के आलम में छोड़ कर चल दीं। इस घटना ने हमारे जीवन की दिशा ही बदल दी। इसीलिए वह आज भी हमारे हर कामों में शामिल होती हैं और कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जब हम उनकी याद नहीं करते। भोजन करते समय हम अक्सर कहते हैं कि खाना अब वैसा स्वादिष्ट नहीं होता जैसा माँ बनाती थीं, आखिर उसमें उनके हाथों के वात्सल्य की खुशबू और स्वाद होता था। यह पहला मौका है, जब मैं भारत में, अपने आश्रम में अपना जन्मदिन मना रहा हूँ और माँ मेरे लिए जन्मदिन की मिठाइयाँ और खाना नहीं बना रही हैं। आज मेरा मन ही नहीं है कि अपना जन्मदिन मनाऊँ और हमने यही निर्णय किया है कि किसी मेहमान को इस अवसर पर आमंत्रित नहीं करेंगे।
यह दिन मैं अपनी प्यारी माँ को समर्पित करना चाहता हूँ, मेरी कल्पना में दुनिया की सबसे शानदार माँ! अम्माजी को, जिन्होंने मुझे और मेरे तीन सहोदरों को जन्म दिया और जो मेरे जीवन के चालीस साल, जिनमें न सिर्फ मैंने अपने जीवन को बदला बल्कि उसके जीवन में भी बदलावों का कारण बना, मुझसे बिना शर्त, निस्वार्थ प्रेम करती रहीं। उन्हें अपनी बेटी को अपने से पहले दुनिया से बिदा होते देखने का दुख झेलना पड़ा। जिन्होंने अपनी पुत्री की तरह मेरी पत्नी का घर में स्वागत किया और जिनकी सबसे बड़ी खुशी हमें खाना खिलाना और हमें खुश देखना होती थी। जब मेरी अपनी नवजात बेटी अपरा को उन्होंने अपने हाथों में लिया था तब प्रसन्नता से चमकते उनके चेहरे पर आई मुस्कुराहट मैंने सालों नहीं देखी थी और आज भी उसे भूल नहीं पाता। जी हाँ, मेरा जन्मदिन ही वह दिन है, जब यह महान महिला अम्माजी यानी मेरी माँ बनी थीं।
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