मैं नास्तिकों का कोई संगठन या धर्म क्यों नहीं बनाउंगा! 5 अगस्त 2015

मैंने आपको हमारे आश्रम में हुए नास्तिक सम्मेलन के बारे में बताया था और अपने ब्लॉग में नास्तिकता के विषय में अपने विचार भी रखे थे। उस सम्मेलन में और उसके बाद सोशल मीडिया में भी, मुझसे कई बार पूछा गया कि क्या मैं नास्तिकों का कोई संगठन बनाने जा रहा हूँ। इस दौरान हुए अनुभवों ने मेरे ऐसा कुछ न करने के पूर्व-निर्णय को सही साबित किया है!

मेरा मानना है कि ऐसा करने पर एक न एक दिन उस संगठन का अपने आप में एक धर्म बन जाने का खतरा होगा! आप सभी को पता है कि धर्म के बारे में मैं क्या सोचता हूँ– और मैं ऐसा कभी भी नहीं चाहूँगा! लोग कहते हैं कि वह धर्म नहीं बनेगा क्योंकि मैं ईश्वर को नहीं मानता! लेकिन यदि आप बौद्ध धर्म के आरंभ पर नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि वहाँ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ था! बुद्ध कहते थे, आप स्वयं अपना प्रकाश बनिए और आज बौद्ध धर्म पाँचवा वैश्विक धर्म है!

ईश्वर पर आस्था सभी धर्मों का आधार नहीं है। ऐसे बहुत से लोग, संप्रदाय और धर्म हैं, जिनके पास ईश्वर की कोई धारणा नहीं है। लेकिन वे भी बहुत सी मूर्खताओं पर विश्वास करते हैं! मेरे लिए, नास्तिकता केवल ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास न करना ही नहीं है। मैं हर तरह के अंधविश्वासों को नकारता हूँ और उसके साथ पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य और वैसी ही बहुत सी दूसरी मिथ्या अवधारणाओं और विचारों को भी!

कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि हिंदुओं के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथों में, अर्थात वेदों में, पहले से कुछ ऋचाएँ मौजूद हैं, जो कम से कम अज्ञेयवादी नज़र आती हैं अर्थात उनमें ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त किया गया है। विशेष रूप से ऋग्वेद बताते हैं कि हम नहीं जानते कि सृष्टि की रचना किसने की। मैंने जवाब दिया कि हो सकता है कि आप नहीं जानते लेकिन फिर भी इससे लगता है जैसे 'कोई न कोई' है, जिसने इस संसार की रचना की है। ठीक? दूसरे धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए भी कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर रहित संसार की अवधारणा बहुत समय पहले से ही मौजूद रही है।

मुझे समझ में नहीं आता कि हमें इन उदाहरणों की ज़रूरत क्यों है! जिन लोगों ने इन धर्मग्रंथों की रचना की थी, कितने भी समय पहले की हो, वे भी हमारे जैसे इंसान ही थे। उनके मन में कुछ विचार आए और उन्होंने उन्हें लिखकर रख लिया। अगर आप उनके लिखे शब्दों को ध्यान से पढ़ें, उनका अध्ययन करें, उनसे कुछ सिद्ध करना चाहें या उनसे कोई रहस्य खोज निकालना चाहें तो आप उसी रास्ते पर होंगे, जिन पर चलकर सभी धर्म आज इस हालत में पहुँचे हैं। आप इन धर्मग्रंथों को एक सहारे की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, उससे मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते हैं कि किस पर भरोसा किया जाए।

मेरी नज़र में नास्तिकता यह कभी नहीं हो सकती। शून्य से लोगों के विचारों का नेतृत्व करने का काम इसका नहीं है और इसका कारण सिर्फ एक है: यह एक प्रतिक्रिया स्वरुप रखा गया कदम है! यह रास्ता आपने अपने पहले कदम के साथ नहीं चुना है बल्कि यह रास्ता आपने तब चुना, जब आपने धर्म के रास्ते को निरस्त किया! यह रास्ता ईश्वर के भ्रमजाल के विरुद्ध है, धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध एक बागी विचार। आप धर्म पर, अन्धविश्वास पर और ईश्वर की मिथकीय छवि पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। अगर आस्तिकता न होती तो नास्तिकता की भी ज़रूरत नहीं होती। धर्म की अनुपस्थिति में या बिना ईश्वर की कल्पना से अवगत हुए विकसित हो रहा बच्चा नास्तिक भी नहीं होगा। वह महज सहज स्वाभाविक होगा।

नास्तिकता एक प्रतिक्रिया है। और इसलिए मुझे पढ़ने वाले सभी नास्तिकों से मैं कहना चाहता हूँ कि कृपया किसी नास्तिक धर्म की स्थापना के इरादे से किसी धर्मग्रंथ की खोज करने की कोशिश न करें। नास्तिकता किसी रूढ़ि का अनुसरण नहीं करती, वह पूर्णतः व्यक्तिगत विचार है। अपने स्वयं के अनुभवों के बारे में बात करें, अपने विचार, अपनी भावनाएँ व्यक्त करें। आज के बारे में बात करें, अतीत की किसी पुस्तक के बारे में नहीं! यह आपके बारे में है!

कोई भी संगठन इन भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को, उनकी अलग-अलग भावनाओं को, अलग-अलग शख़्सियतों को एक सूत्र में नहीं बांध सकता और न ही उन सबके लिए एक निश्चित नियमावली या ढाँचा तैयार कर सकता है। ऐसा करने पर लोगों को एक बार फिर किसी के आदेशों का अनुपालन करना होगा और वे अपना व्यक्तित्व खो देंगे। यही धर्म का काम है। इसलिए, नहीं! मैं किसी नास्तिक धर्म की स्थापना करने नहीं जा रहा हूँ!

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