आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि नास्तिकों के लिए कोई संगठन स्थापित करने की मेरी कतई कोई इच्छा नहीं है और न ही कोई इरादा है। कल मैंने बताया कि उसके एक धर्म में तब्दील हो जाने का बहुत बड़ा खतरा है और यह भी कि नास्तिकता को परिभाषित करने के परंपरावादी तरीके से हमें दूर रहना चाहिए। आज मैं आपको इसका एक और कारण बताता हूँ: ऐसे किसी संगठन के लिए आवश्यक ढाँचा मुझे नापसंद है!
आप जानते ही हैं कि आश्रम में इतने सारे नास्तिकों से मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मैंने उनके सान्निध्य का बहुत आनंद उठाया। भविष्य में भी मैं नास्तिकों को अपने आश्रम में आमंत्रित करना चाहूँगा, जिससे वे एक-दूसरे के साथ मिल-बैठकर चर्चा कर सकें, नज़दीक आ सकें और ऐसी सभाओं के लिए कोई नियत स्थान भी उपलब्ध हो सके। चाहे ऑनलाइन हो चाहे रूबरू, मुझे उनके साथ बातचीत करना पसंद है, उन्हें अपने विचार बताना, उनके विचारों से अवगत होना और अपनी ओर से उनकी समस्याओं के हल की दिशा में हरसंभव मदद करना! लेकिन यह सब करने के लिए मैं कोई संगठन खड़ा करना नहीं चाहता!
बहुत से लोगों ने इसके लिए मुझसे व्यक्तिगत रूप से निवेदन किया है और इसलिए, मुझे लगता है, विशेष रूप से उन लोगों को मुझे कोई न कोई उत्तर देना चाहिए: आप एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें आप अपनी नास्तिकता को फिट कर सकें। लेकिन नास्तिकता का तकाज़ा है कि वह मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध हो!
बहुत से लोगों के लिए नास्तिक होने का कारण यह होता है कि वे पुरोहितों को धर्म द्वारा प्रदत्त अनुक्रमणीय आधिपत्य को पसंद नहीं करते! मैं ऐसे किसी संगठन का मुखिया होना पसंद नहीं करूँगा क्योंकि युवावस्था में और वयस्कता की शुरुआत से ही मैं लगभग ऐसे ही पद का, धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु के पद का, अनुभव प्राप्त कर चुका हूँ! मैं लोगों को उपदेश दिया करता था कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे जीवन बिताना चाहिए। मैं उसे पीछे छोड़ चुका हूँ- दूसरे कारणों के अलावा इसलिए भी कि मैं सबके समान होना चाहता था! सामने वाले के साथ मैं सामान्य बातचीत कर सकूँ, यह चाहता था, न कि यह कि बातचीत के दौरान वह मेरे पैर पकड़ ले!
तो, अगर अब मैं कोई संगठन शुरू करता हूँ तो मैं उसका मुखिया होऊँगा। कुछ दूसरे निर्देशक भी होंगे। उसकी व्यवस्था देखने वाले लोग होंगे, जो एक सीढ़ी नीचे होंगे- संगठन में दूसरे नंबर पर। और इसी तरह चलता रहेगा, जिसके चलते होगा यह कि कुछ ऊपर होंगे और कुछ निचली पायदानों पर! मैं मानता हूँ कि हम सब मनुष्य हैं और हम सबको एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। व्यापारिक कंपनियों में यह ढाँचा आवश्यक है, जिससे व्यापार सुचारु रूप से चलाया जा सके लेकिन नास्तिक मित्रों के बीच ऐसी गैर बराबरी देखना मैं पसंद नहीं करूँगा! क्योंकि यही बात दुनिया भर के धर्मों में अत्यंत घृणित रूप से मौजूद है!
क्या करे, किधर जाएँ, कौन सा रास्ता चुनें, यह बताने के लिए आपको किसी और की ज़रूरत क्यों पड़नी चाहिए? आप ऐसे किसी व्यक्ति या समूह की खोज में क्यों लगे हुए हैं? अगर आप खुद पर और अपने अनुभवों पर भरोसा करते हैं तो आप स्वयं ज़्यादा बेहतर तरीके से इस संदेश का प्रसार कर सकते हैं! बिना किसी संगठन के नास्तिकता के बारे में आप लोगों को क्यों नहीं बता सकते?
मैं यह नहीं चाहता। मेरे खयाल से, अगर हमने यह किया तो हम भी किसी संगठित धर्म से और उसके अनुयायियों से बेहतर नहीं होंगे।
तो, जब मैं कहता हूँ कि मैं कभी भी ऐसा कोई संगठन नहीं बनाऊँगा तो मुझ पर विश्वास कीजिए। मज़ाक में भी जब कोई व्यक्ति मुझे 'नास्तिक गुरु' कहता है तो मुझे हँसी आती है लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं होना चाहता!
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