लोगों के जीवन पर धर्म और ईश्वर का प्रभाव – भारत और पश्चिमी देशों के बीच तुलना – 3 अगस्त 2015

नास्तिकता

पिछले सप्ताह मैं नास्तिकता के विषय पर काफी विस्तार से लिखता रहा हूँ और निश्चित ही अभी भी इस विषय पर मेरे मन में अनेकानेक विचार, अवधारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, जिन्हें मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन इस समय मुझे अपने पश्चिमी पाठकों का भी विचार करना चाहिए। मैं जानता हूँ कि वहाँ बहुत से लोगों के लिए इस बात का वास्तव में कोई महत्व नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। और दरअसल यही बात मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ साझा करना चाहता हूँ और यह करते हुए पश्चिमी मित्रों को भी सहज ही यह पता चल जाएगा कि क्यों भारत में यह विषय इतना विस्फोटक है!

वास्तव में इसका संबंध संस्कृतियों के बीच मौजूद अंतर से है: पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जिनके बारे में ठीक तरह से मैं भी नहीं जानता कि वे ईश्वर पर आस्था रखते हैं या नहीं। भारत में यह तुरंत पता चल जाता है। पश्चिम में मेरे बहुत से मित्र हैं, जो किसी न किसी धर्म का, ज़्यादातर ईसाईयत का, अनुसरण करने वाले हो सकते हैं- लेकिन इसके बावजूद, अधिकांश विषयों पर हमारे विचार एक समान ही हैं! यह एक ऐसी बात है, जो भारत में सहज संभव नहीं है।

यह एक तथ्य है कि पश्चिम में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए धर्म और ईश्वर का विशेष महत्व नहीं है। वे एक विशिष्ट धार्मिक घेरे के भीतर रहकर बड़े होते हैं, बप्तिस्मा करवाते हैं, यौवन के ईसाई पुष्टिकरण कर्मकांड आयोजित करते हैं और फिर चर्च में जाकर शादी भी करते हैं। संभव है, वे क्रिसमस और ईस्टर के दिन चर्च भी जाते हों। लेकिन उसके बाद उनके सामान्य जीवन में धर्म की कोई दखलंदाज़ी नही होती, अक्सर वे धर्म और ईश्वर के विषय में बात करना भी पसंद नहीं करते। दैनिक जीवन में वे ईश्वर का विचार तक मन में नहीं लाते, भले ही उनके प्रति उनका बुनियादी रवैया कुछ भी हो।

इसलिए जब दो ऐसे लोग आपस में मिलते हैं तो उनके बीच उनकी आस्थाओं का व्यवधान नहीं होता। वे इसकी कतई परवाह नहीं करते कि सामने वाला ईश्वर पर विश्वास रखता है या नहीं क्योंकि वे नहीं समझते कि इसका ज़रा सा भी महत्व है। परिवार में अगर उनका लड़का कहे कि वह भविष्य में चर्च नहीं जाना चाहता या अपना विवाह चर्च में नहीं बल्कि कोर्ट में पंजीकृत करवाना चाहता है तो माता-पिता आसानी से उसकी बात मान लेते हैं। इसी तरह कोई लड़की क्रिसमस के दिन चर्च चली जाएगी, भले ही वहाँ के पादरी की कही बातों पर उसका एक रत्ती भरोसा न हो।

भारत में मामला बहुत अलग है। यहाँ आस्थाओं के प्रश्न परिवारों को जुदा कर देते हैं! दैनिक जीवन में आस्था बहुत बड़ी भूमिका अदा करती है और जितना अधिक आपके आसपास के लोग धार्मिक और परम्परावादी होंगे उतना ही आपका बचपन धार्मिक त्योहारों, समारोहों, रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों के बीच गुज़रेगा। कुछ नियत दिन या सप्ताह होंगे जब उपवास रखना होगा, कुछ अवसरों पर मन्दिर जाना ज़रूरी होगा तो कुछ दिन आप मन्दिर नहीं जाएँगे। दूसरों की धार्मिक भावनाएँ न दुःखें या देवता अप्रसन्न न हो जाएँ इसलिए कुछ अवसरों पर धारण किए जाने वस्त्रों के बारे में आपको कुछ नियम याद रखने होंगे और यह भी कि किन भावभंगिमाओं या मुद्राओं और शब्दों का उपयोग करना है और किनका नहीं करना है। यहाँ इस बात पर लोगों की बहुत गहरी आस्था होती है कि आपका अच्छा-बुरा इन सब बातों पर निर्भर होता है!

इसलिए जब बेटा घोषणा करता है कि वह ईश्वर पर विश्वास नहीं रखता तो अभिभावक चिंताग्रस्त हो जाते हैं, गुस्सा होते हैं, उन्हें समझ नहीं आता कि अब क्या किया जाए। यार-दोस्त समझ नहीं पाते और सामान्य दैनिक कार्यकलापों पर विराम सा लग जाता है क्योंकि कोई भी अंतहीन वाद-विवाद, तनातनी और झगड़े नहीं चाहता! उनकी पुरानी जीवन-चर्या समाप्त हो जाती है, अपने परिवेश से कटकर वे पूरी तरह अलग, कोई नई सामाजिक मंडली खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इसीलिए यहाँ यह चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके दैनिक जीवन के बारे में है, सिर्फ सालाना दो छुट्टियों के बारे में ही नहीं। आपके रवैये और नज़रिए की जड़ कहाँ है, इस बारे में है। और इसलिए मुझे हमेशा लगता रहा है कि मैं इस विषय में पहल करूँ, बातचीत करूँ- क्योंकि आम तौर पर लोग इस विषय में चर्चा करते हुए घबराते हैं!

मैं खुद एक धार्मिक और आस्तिक से नास्तिक हुआ हूँ। मुझे महसूस हुआ है कि उसके बाद मेरे बहुत से भारतीय मित्र मुझसे दूर हो गए, यहाँ तक कि दोस्ती तोड़ ली। लेकिन मेरे पश्चिमी मित्रों के साथ मुझे यह अनुभव नहीं झेलना पड़ा- ज़्यादातर लोगों के साथ मुझे लगता रहा कि इससे उन्हें कोई मतलब ही नहीं है! इसे इस तरह समझिए कि आस्था से ज़्यादा उनके लिए व्यक्ति का महत्व था!

मैं पहले कह चुका हूँ कि ज़्यादा से ज़्यादा नास्तिक होंगे तो दुनिया बेहतर जगह हो जाएगी। इसका संबंध इस बात से नहीं है कि आप ईश्वर को मानते हैं या नहीं। और इसीलिए यह बात दुनिया के लिए इतनी आवश्यक है! लेकिन उस विषय में आगे चर्चा कल!

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