नास्तिक दूसरों की सहायता करने के लिए अच्छे काम करते हैं, पुण्य कमाने के लिए नहीं – 29 जुलाई 2015

नास्तिकता

कल मैंने बताया था कि बहुत से लोग यह मानते हैं कि नास्तिक न सिर्फ नीरस होते हैं और आनंदरहित जीवन बिताते हैं बल्कि वे संवेदनशील और परोपकारी भी नहीं होते। उनके विचार से नास्तिकों में करुणा का अभाव होता है और वे मतलबी होते हैं। आज मैं अपने ब्लॉग के ज़रिए इस पूर्वाग्रह का खंडन करना चाहता हूँ।

सबसे पहले यह देखते हैं कि ये विचार कहाँ से आते हैं। नास्तिक और आस्तिक में क्या भिन्नता है? एक समूह ईश्वर को मानता है और दूसरा नहीं। तो, जो ईश्वर को मानते हैं, वे सोचते हैं कि वे ही दूसरों की सहायता करते हैं, जबकि नास्तिक नहीं करते। अर्थात, वे मानते हैं कि ईश्वर ही उन्हें लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करता है। यह रोचक है, क्योंकि इसका आशय यह है कि आप इसलिए परोपकार करते हैं क्योंकि ईश्वर ने धर्मग्रथों में ऐसा करने को कहा है- ठीक? अगर आप स्वयं अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते, बीच में ईश्वर नहीं होता तो आपके अनुसार, आप कोई भी भला काम नहीं करते, जो आप अभी कर रहे हैं?

यदि यह सत्य है, तो यह नास्तिक बेहतर इंसान हैं, क्योंकि वे अच्छे कार्य केवल इसलिए करते हैं कि उन्हें वह उचित लगता है। इसलिए नहीं कि पिता जैसी छवि रखने वाला कोई काल्पनिक चरित्र उन्हें ऐसा करने का आदेश देता है। इसलिए नहीं कि वे किसी काल्पनिक बहीखाते में पुण्य जमा कर रहे हैं!

मैं आपको नास्तिकों में मौजूद दयाभाव और परोपकार का एक उदाहरण देता हूँ, जो हमारे इस आयोजन के तुरंत बाद हाल ही में सामने आया है। युवा नास्तिकों का एक समूह हमारे कार्यक्रम के बाद टेम्पो ट्रेवलर से आगरा के लिए निकला। हमने एक स्थानीय टॅक्सी ऑपरेटर से कह कर टेम्पो ट्रेवलर की व्यवस्था कराई थी। आगरा के रास्ते में उनके सामने एक दुर्घटना घटित हुई और उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। मुझे नहीं पता, वास्तव में वहाँ क्या हुआ परन्तु दुर्घटना में कई लोग घायल हुए थे और उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। उस छोटे से समूह ने जोकि ताजमहल देखने जा रहे थे, तुरंत निश्चय किया कि वे पहले उन घायलों को अस्पताल पहुँचाएँगे!

दुर्भाग्य से गाड़ी के वाहन चालक ने, जो एक स्थानीय व्यक्ति ही था, मना कर दिया। वह पुलिस से साथ कोई मुसीबत न हो, इस डर से या किसी और कारण से या अकारण घबरा गया। वह जीप से दूर, अलग जाकर खड़ा हो गया, यह दिखाने के लिए कि यदि वे लोग किसी घायल को साथ लेकर जाना चाहते हैं तो वह गाड़ी नहीं चलाएगा।

असमंजस की स्थिति में कि क्या करें, वे सड़क के किनारे खड़े होकर दूसरी गाड़ियों को इशारों से और हाथ हिला-हिलाकर रोकने की कोशिश करने लगे। अंततः एक कार रुकी और चालक उन घायलों को साथ लेकर अस्पताल चलने के लिए तैयार हो गया।

तो, एक ऐसा ईश्वरभक्त व्यक्ति, जिसने अपनी गाड़ी के दोनों तरफ बड़े-बड़े अक्षरों में राधे-राधे लिखवा रखा है, और तो और स्वयं भी एक धार्मिक पहनावे में है और जिसने बाकायदा धार्मिक शृंगार किया हुआ है, एक खून से लथपथ घायल व्यक्ति को अपने साथ ले जाने के लिए मना कर देता है जबकि बाहर से आया एक नास्तिकों का दल, अपने कार्यक्रम की परवाह किए बगैर उस घायल व्यक्ति की जान बचाने के लिए एक अनजान जगह में वह सब कुछ करने के लिए राज़ी है, जो वह कर सकता है।

हालांकि मेरे लिए यह कोई बड़ा आश्चर्य नहीं है–क्योंकि एक अधार्मिक व्यक्ति अपनी सहज प्रवृत्ति पर, अपने तर्कपूर्ण विचारों पर भरोसा करते हुए स्वयं अपनी मर्ज़ी से निर्णय लेता है जबकि धर्म अपने अनुयायियों को भय का अनुसरण करना सिखाता है। इसलिए जबकि यह धार्मिक व्यक्ति सोच ही रहा था कि क्या-क्या बुरा हो सकता है, ये नास्तिक अपना काम कर चुके थे, अपने सामने घायल पड़े हुए व्यक्ति की सहायता करने की एकमात्र इच्छा के वशीभूत!

अपने स्कूल के बच्चों के लिए किए जा रहे हमारे कार्य आपको सहमत नहीं करते तो शायद यह घटना आपके लिए एक प्रमाण है कि नास्तिक लोग वास्तव में अच्छे कार्य करते हैं, दूसरों की सहायता हेतु सदा तत्पर रहते हैं- जबकि धार्मिक लोग भयभीत होकर पीछे हटने के बहाने ढूँढ़ते रहते हैं!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

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