मेहमानों से हम आजकल यह नहीं कहते कि ‘इसे अपना ही घर समझिए’! क्यों? – 21 मई 2013

आश्रम

कल मैं यह लिखते हुए कि हमारे एक मेहमान ने हमारे एक कर्मचारी के साथ यौन संबंध स्थापित कर लिए थे, याद कर रहा था कि हम अपने मित्रों से मज़ाक में कहते रहते थे कि मेहमानों के अनुभवों पर पूरी एक किताब ही लिखी जा सकती है। हमारे मेहमानों में कई तो बड़े मज़ाकिया लोग भी आ जाते हैं! उन्हीं को याद करते हुए मैंने सोचा कि उनमें से कुछ के बारे में यहाँ अपनी डायरी में भी लिखना चाहिए जिससे पाठक भी उसका आनंद उठा सकें।

सबसे पहले पूर्वी यूरोप की एक महिला मेहमान, जिसके यहाँ हम एक बार हो आए थे,की बात बताता हूँ। वहाँ हम उससे मिले ज़रूर थे मगर ठीक से उसे समझ नहीं पाए थे। हमें इतना भर पता था कि उसकी अपने आपसे यानी स्वगत, बात करने की आदत है। यह थोड़ा असाधारण बात ज़रूर थी मगर हमने उसे बहुत विचारणीय नहीं समझा। लोगों की अजीबोगरीब और मज़ेदार आदतें होती हैं, और अगर सब लोग एक जैसे हो जाएँ और दुनिया ऐसे विचित्र लोगों से खाली हो जाए तो वह बहुत उबाऊ लगने लगेगी! मैं जब विदेश जाता हूँ तो लोगों को आमंत्रित करने के मामले में कोई कंजूसी नहीं करता, सबको दिल खोलकर आश्रम आने का न्योता देता हूँ। इसलिए जब इस महिला ने हमें सूचना दी कि वह हमारे आश्रम में मेहमान बनना चाहती हैं तो हम बड़े खुश हुए। मगर हमें पता नहीं था कि आगे चलकर क्या गुल खिलने वाला है।

आश्रम में जब भी कोई मेहमान आता है हम उनका बांह फैलाकर स्वागत करते हैं और उन्हें उनके कमरे तक पहुंचाकर कहते हैं: इसे अपना घर ही समझिए! आज भी स्वागत तो हम उसी गर्मजोशी के साथ करते हैं मगर इस 'स्वागत-संदेश' का उद्घोष हमने स्थगित कर दिया है। इसका कारण यह महिला हैं जिन्होंने इस संदेश को बहुत शाब्दिक अर्थ में ले लिया था!

एक दिन हमने देखा कि वह महिला बगीचे में टहलते हुए एक पेड़ के नीचे रुकीं और उसकी शाखाओं से छेड़खानी करने लगीं। वहाँ अपनी सुविधानुसार मेरे पिताजी बागवानी के कुछ औज़ार और रस्सियाँ रखते थे जिनकी लगभग रोज़ ही सुबह शाम ज़रूरत पड़ती थी। उनके लिए यह बहुत स्वाभाविक था लेकिन उस महिला को उन चीजों का वहाँ होना बहुत खराब लगा और जैसा कि वे पहले ही आश्रम को अपना घर समझने लगीं थीं, उन्होंने उन औजारों को वहाँ से उतारना शुरू कर दिया!

यशेंदु ने उन्हें औजारों को एक-एक कर उतारते देखा और बीच में ही रोक दिया और पूछा कि वे ऐसा क्यों कर रही हैं? उस महिला ने कहा कि बगीचे में पेड़ पर लटके औज़ार सारे बगीचे की शोभा बिगाड़ रहे हैं और मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है! यशेंदु ने उन्हें नम्रता पूर्वक समझाया कि बगीचे का सारा काम पिताजी देखते हैं और उससे छेड़खानी करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।

शायद यशेंदु ने अपनी बात पर्याप्त से ज़्यादा ही नम्र शब्दों में कही थी या फिर उसकी बात उस महिला को समझ में नहीं आई थी। उनका एक और कारनामा हमारा इंतज़ार कर रहा था! उसके आश्रम में रहने के दौरान ही एक दिन हम सपरिवार अपने एक मित्र से मिलने गए। और जब वापस आए तो क्या देखते हैं कि पूर्णेन्दु का सारा कमरा बदला हुआ है: हुआ यह था कि इस दौरान वह पूर्णेन्दु के कमरे में आई थी और उसे उसके कमरे की व्यवस्था या साज सज्जा पसंद नहीं आई थी और उसने अपना सफाई अभियान और चीजों को अपनी मरज़ी के अनुसार सजाना-रखना शुरू कर दिया था। उसने उसके कबर्ड को व्यवस्थित किया, जी हाँ, भीतर से; और बिस्तर को ठीक किया और पलंग के नीचे से सारे जूते निकालकर दीवार के साथ करीने से जमाकर रख दिये! फिर शायद उसके मन में आया कि फर्श भी धो डाले मगर उसे फर्श धोने का पाउडर नहीं मिला। हाँ, संडास में उसे नीले रंग का खुड्डी साफ करने का एसिड-मिश्रित द्रव मिल गया। अब अगर मैं आपको यह बताऊँ कि पूरे आश्रम में मार्बल का फर्श है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि पूर्णेन्दु के कमरे का क्या हश्र हुआ होगा! वह फर्श जो पहले आईने की तरह चमचमाता था अब एकदम बदरंग पड़ चुका था और सारे कमरे में टॉइलेट क्लीनर की गंध भर गई थी!

उसकी याद करके मैं आज भी हंस पड़ता हूँ और उस वक्त तो हंसने के सिवा हमारे पास चारा ही क्या था! आप बताएं, कि कौन किसी दूसरे के बेडरूम में जाएगा और उसे साफ करना शुरू कर देगा; वह भी उसकी सबसे व्यक्तिगत वस्तुएं! अब मुझे यह तो याद नहीं है कि हमने उसे और भी ऐसी ही बेवकूफ़ियाँ करने से कैसे रोका मगर आगे से आश्रम में आने वाले मेहमानों से काफी सोच-विचारकर ही यह कहते हैं कि 'इसे अपना ही घर समझिए'!

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