अगर आप भारत में हमारे आश्रम आते हैं तो यहाँ बहुत से जानवरों से आपकी मुलाक़ात होगी। जी नहीं, पालतू नहीं-जंगली, आवारा, देसी जानवरों से। यहाँ आपको लगेगा कि आप किसी चिड़ियाघर में आ गए हैं!
हँसी-मज़ाक में हम अक्सर इसकी चर्चा करते रहते हैं! जब आप हमारे बगीचे में सैर करते हैं या बेंच पर आराम से बैठे हैं तब स्वाभाविक ही तरह-तरह की चिड़ियाँ और तितलियाँ आपका मनोरंजन करेंगी लेकिन आपको कई बंदर और गिलहरियाँ भी नज़र आएँगी। जब आप शहर में घूमने निकलेंगे तो उधम मचाते आवारा कुत्तों, बेसहारा गायों, अनियंत्रित सूअरों और आज़ादी के साथ इधर-उधर मुँह मारती बकरियों के दर्शन होंगे। आपको घोड़े, गदहे और कभी-कभी ऊँट भी मिल जाएँगे-लेकिन ऊँट अक्सर कोई गाड़ी खींचते या अपनी पीठ पर कोई बोझा ढोते हुए ही दिखेंगे। यह संभव ही नहीं है कि आप हमारे शहर में पैदल घूम-फिर रहे हैं और आपको किसी गाय से बचने की या उसे रास्ता देने के लिए अलग हटने की ज़रूरत न पड़ी हो क्योंकि गाएँ आपको हर जगह खुले आम सड़क पर घूमती हुई मिल जाएँगी या बीच सड़क पर जुगाली करते हुए! ऐसा नज़ारा आप अपने यहाँ रोज़-ब-रोज़ नहीं देखते होंगे! ठीक?
आप अपने कमरे में ही क्यों न बैठे हुए हों, आपको कोई न कोई ऐसा जानवर दिखाई दे जाएगा जिसे आप अक्सर घरों में देखने के आदी नहीं होते! एक बार आश्रम की एक मेहमान पहले ही दिन बड़ी उत्तेजित, हमारे पास आई। सीढ़ियों से तेज़ी से उतरते हुए उसकी साँस रुक रही थी और कुछ कहने से पहले उसे एक गहरी साँस भरनी पड़ी और बात करते हुए भी वह गहरी साँसे लेती रही: "मेरे कमरे में एक मगर का बच्चा है!" पल भर के लिए हम भी स्तब्ध रह गए! दौड़ते हुए उसके साथ ऊपर पहुँचे और सावधानी पूर्वक दरवाजा खोलकर उधर देखा जिधर वह इशारा कर रही थी। वह छत की ओर इशारा कर रही थी कि वहाँ! और एक छिपकली वहाँ मज़े में शांतिपूर्वक बैठी हुई थी! खैर, अगर आपने जीवन में कभी छिपकली न देखी हो तो उसे देखकर आप यही सोचेंगे कि रेंगने वाले किसी बड़े जीव का बच्चा होगा!
निश्चय ही गिरगिट से आपको डरने की ज़रूरत नहीं है लेकिन शायद बंदर के साथ आप अधिक सतर्क रहना चाहेंगे! यहाँ के बंदर बड़े शैतान और शातिर चोर हैं और शहर के बीचोंबीच उनके झुंड आदतन लोगों की आँखों पर से चश्में चुरा लेते हैं। चश्मा लेकर वे कूदकर किसी दीवार पर चढ़कर बैठ जाते हैं। फिर आपकी सहायता के लिए कोई आगे आता है और उनकी ओर बिस्किट या फ्रूट जूस का पाउच फेंकता है और उसे लपकने के लिए वे चश्मा फेंक देते हैं और चश्मा वापस दिलाने की एवज में स्वाभाविक ही आप उस व्यक्ति को कुछ न कुछ इनाम देने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उस व्यक्ति को कुछ पैसे मिल जाते हैं, बंदर को बिस्किट मिल जाते हैं और आपको आपका कीमती चश्मा: सबका लाभ, सब खुश!
हालाँकि आश्रम में भी बहुत से बंदर मौजूद हैं, हमें अपने चश्मों की उतनी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन बगीचे की निगरानी ज़रूर करनी पड़ती है क्योंकि वे उसे अपना खेल का मैदान समझ लेते हैं और पेड़ों की डालियों पर कूदते-फांदते रहते हैं, झूलते-लटकते हैं, फूल-पत्तियों से खेल-खिलवाड़ करते हैं; कुल मिलाकर बड़ा नुक्सान पहुँचाते हैं। कई बार पेड़ों की डगालें तक टूट जाती हैं। लेकिन देखने में वे बड़े प्यारे लगते हैं-और सामान्यतया अगर आप उन्हें अकेला छोड़ दें तो कोई समस्या पेश नहीं आती और वे भी आपकी तरफ ध्यान नहीं देते।
हाल ही में जानवरों से अत्यधिक प्रेम करने वाली एक महिला मित्र आश्रम आई थी और बाहर आवारा कुत्तों को देखकर उसके मन में दया जाग उठी और उसने उनकी मदद करने की ठानी। यह उतना आसान नहीं है लेकिन अंततः उसने एक दूकान खोज ही निकाली, जहाँ कुत्तों का तैयार भोजन मिलता है। बड़े गर्व के साथ वह एक बड़े से थैले में खाना भरकर दूकान से बाहर निकली। कुत्तों का पहला झुंड देखते ही वह रुकी और थैला खोलकर थोड़े से खाने के टुकड़े उनके लिए ज़मीन पर रख दिए। उस दिन हमें पता चला कि वृंदावन के आवारा कुत्ते कुत्तों का तैयार पैकेज्ड फ़ूड पसंद नहीं करते! आखिर उसे बंदरों और सूअरों ने खाया!
मुझे एक और मेहमान की याद आ रही है जो अपने आप में एक अजूबा ही थी-वैसा व्यक्ति आज तक मुझे नहीं मिला: वह गिलहरियों से डरती थी! वास्तव में वे दुनिया के सबसे शर्मीले और डरपोक प्राणी होते हैं और बड़े प्यारे भी! वे बचा हुआ खाना, नीचे पड़े खाने के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। अक्सर आप उन्हें किसी सुरक्षित स्थान पर अपने सामने वाले पैरों में खाना लिए कुतरते हुए देख सकते हैं। ये महिला आश्रम में पेड़ के नीचे खाने की प्लेट लिए बैठी थी और एक चंचल सी गिलहरी खाने के टुकड़े गिरने की अपेक्षा में उसकी तरफ लपकी। महिला उसे हाथ के इशारों से हकालने लगी तो स्वाभाविक ही, डर के मारे गिलहरी उसके चारों ओर चक्कर काटने लगी। महिला ने अपने पीछे उसकी आवाज़ सुनी तो उसे लगा गिलहरी पीछे से हमला करने वाली है और वह पहले तो चीखती-चिल्लाती, वहीं कूद-फांद मचाने लगी और फिर अंदर भागी। हमारे कर्मचारियों ने आवाज़ सुनी तो भागते हुए आए कि कोई बंदर परेशान कर रहा होगा। लेकिन एक पेड़ के पीछे से ताकती, स्वाभाविक ही, बहुत घबराई सी गिलहरी को देखकर वे सब हँसे बिना न रह सके और फिर महिला सहित हम सब भी हँस-हँस कर लोट-पोट हो गए!
तो, अगर आप कोई दर्शनीय चिड़ियाघर देखने का इरादा कर रहे हैं और खुद जानवरों के साथ रहने का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारा आश्रम आपको बढ़िया लगेगा!
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