एक अधार्मिक आश्रम धार्मिक प्रश्नों के क्या उत्तर देता है – 11 फरवरी 2015

आश्रम

कल मैंने आपको बताया था कि जैसे-जैसे मुझमें और मेरे परिवार में परिवर्तन आता गया वैसे-वैसे हमारे आश्रम में भी परिवर्तन आता गया। अब वह एक गैर-धार्मिक आश्रम बन गया है, जिसे लोग पसंद करते हैं, खास कर अगर वे गुरु और धर्म की खोज में या, पूजा-अर्चना करने यहाँ नहीं आए हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे लोग हमसे पूछताछ नहीं करते! ऐसे लोगों से हम क्या कहते हैं?

अगर आपके पास समय कम है और आगे नहीं पढ़ना चाहते तो एक वाक्य में मैं इसका उत्तर बताता हूँ: हम उनसे हमारे यहाँ न आने के लिए कहते हैं। लेकिन विस्तार से इसका उत्तर मैं आगे लिख रहा हूँ।

जब हमारे बारे में कोई लिखित पूछताछ करता है तो उसके ईमेल की पंक्तियों के बीच पढ़कर ही हमें बहुत सी बातों का एहसास हो जाता है। जब कोई व्यक्ति हमारी नज़र में उपयुक्त नहीं होता तो यह आसानी के साथ पता चल जाता है: उसकी भाषा से, लिखने के तरीके से और यहाँ तक कि उसके नाम से भी अकसर उसके धार्मिक रुझानों और उनकी तीव्रता का पता चल जाता है। कुछ संप्रदाय खास तरह के नामों का प्रयोग करते हैं और दूसरों के लिए भी, अर्थात हमारे लिए भी, उनके सम्बोधन अलग तरह के होते हैं।

आम तौर पर हम उन्हें नम्रतापूर्वक मना कर देते हैं। न सिर्फ अपनी मानसिक शांति के लिए बल्कि उनके भले के लिए भी। हम पहले से जानते हैं कि वे यहाँ अपने समय का पूरा आनंद नहीं उठा पाएंगे! उन्हें यहाँ अच्छा नहीं लगेगा और उन्हें वे अनुभव नहीं मिल पाएंगे, जिनकी तलाश में इतनी दूर यात्रा करके आएँगे!

लगातार मंत्रोच्चार और धार्मिक समारोहों का माहौल उन्हें हमारे आश्रम में नहीं मिलेगा। यहाँ कोई साधू-संत नहीं हैं और न ही ध्यान लगाने के लिए अक्सर प्रोत्साहित किए जाने वाला दार्शनिक ज्ञान उन्हें यहाँ उपलब्ध होगा।

जीवन में जिन बातों को वे लोग महत्व देते हैं, हम लोग उन बातों पर विश्वास ही नहीं करते। और इसलिए ये सेवाएँ हम प्रदान भी नहीं करते और स्वाभाविक ही वे यहाँ आकर असंतुष्ट रह जाएँगे!

और ऊपर से, यहाँ आकर वे अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएँगे, कोशिश करेंगे कि किसी तरह उनकी आस्था का प्रचार कर सकें, उसे बिकाऊ माल की तरह यहाँ बेच सकें। अक्सर दूसरे यह पसंद नहीं करते और अगर वे हमारे मेहमान हैं तो दूसरे सभी यहाँ असुविधा महसूस करेंगे और आश्रम में हर वक़्त अशांति का माहौल बना रहेगा।

इसलिए हम उन्हें यहाँ आने के लिए क्यों कहें? हम अपने यहाँ व्यर्थ ही अप्रसन्न और बोझिल वातावरण निर्मित होता क्यों देखें? जी नहीं, हम बड़ी नफासत के साथ उन्हें मना करते हैं। अक्सर लोग समझ जाते हैं-और मेरी नज़र में यह इसका सबसे ईमानदार तरीका है।

वे अपने जैसे लोगों के बीच रहें और हम अपने जैसे लोगों के साथ रहें। यही सबसे उचित है। 🙂

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