जैसा कि मैंने पहले ज़िक्र किया था, एक व्यक्ति ने मेरे बारे में शंका ज़ाहिर की थी कि मैं सदा से नास्तिक होते हुए भी एक धार्मिक प्रवचनकार का ढोंग किया करता था और बाद में जब मुझे लगा कि अब अधार्मिक या नास्तिक हो जाना लाभ पहुँचा सकता है तो मैंने अपना ‘वास्तविक चरित्र’ उजागर कर दिया और अधार्मिक और नास्तिक हो गया। मैंने यह भी स्पष्ट किया था कि कैसे यह मूर्खतापूर्ण होता क्योंकि धार्मिक और आस्तिक बने रहना आर्थिक रूप से मेरे लिए अधिक लाभप्रद था। मैं एक बार फिर कहना चाहता हूँ कि वृन्दावन जैसे तीर्थ स्थान में, जहाँ हर साल हजारों धार्मिक तीर्थ यात्री आते हैं, एक धार्मिक आश्रम ही आर्थिक रूप से ज़्यादा लाभप्रद हो सकता था। क्या आप ऐसा नहीं मानते?
इसमें कोई शक नहीं कि जब मैं धर्म से दूर हुआ तो मैंने अपने अच्छे-खासे, जमे-जमाए व्यवसाय का त्याग किया था, जो लोगों को बड़ी संख्या में आश्रम की ओर खींच सकने में समर्थ होता। बड़ी संख्या में मेरे अनुयायी थे, जो नियमित रूप से आश्रम आते और ऐसी पृष्ठभूमि वाला प्रतिष्ठित आश्रम होने के नाते तीर्थयात्रियों और दूसरे श्रद्धालुओं के लिए वह एक आदर्श स्थान बन जाता। जैसा कि वृन्दावन के कई दूसरे आश्रमों के साथ हुआ है, निश्चय ही हमारे आश्रम का भी विकास होता और नियमित समारोहों, धार्मिक कार्यक्रमों आदि के कारण वह व्यावसायिक रूप से अच्छी सफलता प्राप्त करता।
लेकिन खुद में हुए परिवर्तन के साथ मैंने ईमानदार बने रहने का फैसला किया। हम हमेशा घोषित रूप से कहते रहे कि सांप्रदायिक लोगों से हमारी पटरी नहीं बैठ सकती। धर्म और ईश्वर से विमुख होने की घोषणा भी मैंने सार्वजनिक रूप से की थी और इसलिए सभी लोगों को वैसे भी पता था कि हमारा आश्रम दूसरों से अलग है। लेकिन शायद आपको आश्चर्य होगा कि वास्तव में यह अच्छा ही साबित हुआ।
अब लोग यहाँ आकर रहते हैं और धर्मरहित अनुभव का आनंद लेते हैं। उन्हें यहाँ भारतीय संस्कृति में घुलने-मिलने का अवसर मिलता है लेकिन क्योंकि हम कोई धार्मिक संस्कार या कर्मकांड आयोजित नहीं करते इसलिए किसी प्रकार के अवांछित कामों को अंजाम देने की उन्हें ज़रूरत नहीं होती।
हमारे आश्रम में पूजा-पाठ, प्रार्थना या कोई और संस्कार (कर्मकांड) करने के लिए आपको 4 बजे सुबह उठने की ज़रूरत नहीं है। पाबंदी के साथ मौन व्रत रखने का न तो कोई नियम है और न उसका कोई नियत समय। मासिक-धर्म के दौरान इस तथ्य को उजागर करने के लिए कोई विशेष चिन्ह पहनना महिलाओं के लिए आवश्यक नहीं है जिससे भोजन के वक़्त उन्हें अलग बिठाया जा सके। किसी भी तरह के विशेष वस्त्र पहनने का यहाँ कोई नियम नहीं है। हमारे यहाँ कोई गुरु नहीं है कि उसके दैनिक प्रवचन सुनना या उसके चित्र की पूजा-अर्चना करना आपके लिए ज़रूरी हो। फलस्वरूप हमारे यहाँ आने वाला कोई मेहमान भी किसी खास आस्था का प्रचार नहीं करता और न ही अपना मतावलंबी बनाने की कोशिश करता है।
यहाँ आप जैसा चाहें, जिस तरह चाहें, अपनी मर्ज़ी के अनुसार, अपने में मगन रहने के लिए स्वतंत्र हैं। लोग आश्रम आ सकते हैं, शहर घूमने जा सकते हैं, मंदिर देखने जा सकते हैं, गीत-भजन आदि सुन सकते हैं, आसपास होने वाले समारोह या जो मर्ज़ी हो, धूम-फिर के देख सकते हैं-और वापस लौटकर आश्रम में आराम कर सकते हैं, दिन भर में जो कुछ देखा, उसका लेखा-जोखा ले सकते हैं, उस पर चिंतन-मनन कर सकते हैं।
एक ऐसी स्वतंत्र जगह जो आपको किसी ऐसी जगह की याद नहीं दिलाएगी, जहाँ अपने मत आरोपित किए जाते हों। हमारे पास सिर्फ दो चीज़ें हैं: एक संक्रामक रूप से सकारात्मक नज़रिया और जीवन के प्रति प्यार!
और हाँ, पहले कभी इस बात का खयाल नहीं आया था कि लोग इन्हीं बातों को पसंद करते हैं और यही बातें हैं, जिसके चलते वे हमारे पास आना भी पसंद करते हैं। और शायद इसीलिए ईर्ष्यालु लोग हमारे बारे में अजीबोगरीब बातें कहते रहते हैं। जहाँ तक मेरा सवाल है, यह एक और दृष्टांत की तरह मेरे सामने उपस्थित है कि जीवन में कभी भी आपको परिवर्तन से नहीं घबराना चाहिए! ईमानदारी के साथ, प्रयास करते हुए जीवन गुजारें और उद्यम से कभी न कतराएँ!
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